कठिनी  

कठिनी (क्रस्टेशिया) जीवजगत में संधिपाद जीवों (फ़ाइलम) का एक मुख्य विभाग है, जिसमें बड़े केकड़ (Crabs), झींगे (Prawns), चिंगट (श्रृंप, Shrimp), प्रचिंगट (क्रे-फ़िश, cray-fish), महाचिंगट (लॉब्स्टर, lobster), खंडावर (बार्नेकिल, barnacle), काष्ठ यूका (वुड लाउस, wood louse) तथा जलपिंशु (वाटर फ़्ली, water flea) इत्यादि हैं, परंतु इसके सबसे छोटे जीवों को देखने के लिए अणुवीक्षण यंत्र का सहारा लेना पड़ता है। कठिनी की भिन्न-भिन्न जातियों के आकर प्रकार में बहुत ही अंतर होता है जिस कारण इसकी संक्षिप्त परिभाषा देना अत्यंत कठिन है। कठिनी का प्रत्येक लक्षण, विशेषकर इसके पराश्रयी तथा उच्च विशेष जीवों में तो, पूर्ण रूप से किसी न किसी प्रकार बदल जाता है।

क्रस्टेशिया शब्द का उपयोग प्रारंभ में उन जीवों के लिए किया जाता रहा है जिनका कवच कठोर तथा नम्य हो। इसके विपरीत दूसरे जीव वे हैं जिनका कवच तथा भंगुर होता है, जैसे सीप तथा घोंघे इत्यादि। परंतु अब यह ज्ञात है कि सब संधिपाद जीवों का बहि:कंकाल (Fxoskeleton) कठोर तथा नम्य होता है। इस कारण अब कठिनी को अन्य लक्षणों के पृथक किया जाता है। इस वर्ग के जीव प्राय: जलनिवासी होते हैं और संसार में कोई भी ऐसा जलाशय नहीं है जहाँ इनकी कोई न कोई जाति न पाई जाती हो। इस कारण कठिनी वर्ग के जीव प्राय: जलश्वसनिका (गिलस, gills) अथवा त्वचा से श्वास लेते हैं। इनमें दो जोड़ी श्रृंगिका (Antennae) जैसे अवयव मुख के सामने और तीन जोड़ी हनु (mandibles) मुख के पीछे होते हैं।

कठिनी वर्ग के मुख्य परिचित जीव तो झींगें और केकड़े हैं जिनका उपयोग मानव अपने खाद्य रूप में करता है, परंतु इनसे कहीं अधिक आर्थिक महत्व के इसके निम्न जीव ऐंफ़िपाड्ज़, (Amphipods), आइसोपाइड्ज़, (Isopods) इत्यादि, हैं जो उथले जलाशयों में समूहों में रहते हुए सम्मार्जक का काम करते हैं। इन निम्न जीवों का भोजन दूसरे जीव तथा वनस्पतियों की त्यक्त वस्तुएँ हैं और साथ ही यह स्वयं उच्च प्राणियों, जैसे मत्स्य इत्यादि, का भोजन बनते हैं। इसके कई तलप्लावी सूक्ष्म जीव ऐसे भी हैं जिनके समूह मीलों तक सागर के रंग को बदल देते हैं, जिससे मछुओं को उचित मत्स्यस्थानों का ज्ञान हो जाता है। इस प्रकार यह मत्स्य का भोजन बनकर और साथ ही मछुओं की सहायता करके आर्थिक लाभ पहुँचाते हैं।

बाह्य रचना

इस वर्ग के जीवों का कवच दूसरे संधिपाद जीवों के समान ही खंडों के समूहों में विभाजित रहता है, परंतु इनमें से प्राय: कुछ खंड एकीभंजित भी हाते हैं। प्रत्येक खंड कवच अँगूठी के समान होता है, जो अपने अगले तथा पिछले खंड के साथ नम्य इंटेगुमंट (Integument) से जुड़ा रहता है। प्रत्येक खंड का चाप सदृश पृष्ठीय (borsal) पट्ट, स्टर्नम्‌ (Sternum) कहलाता है और टर्गम के दोनों पार्श्व भाग, जो पट्टों के रूप में रहते हैं, प्लूरा (Pleura) कहलाते हैं। प्रत्येक खंड के स्टर्नम के साथ एक जोड़ी अंग जुड़े रहते हैं। शरीर का अंतिम खंड, जिसपर गुदा होती है, अंगहीन रहता है और टेल्सन) कहलाता है। आधुनिक कठिनी में कोई भी ऐसा जीव नहीं मिलता जिसमें प्रत्येक खंड एक दूसरे से स्पष्टतया पृथक हो। उदाहरणार्थ, झींगे के शरीर के अग्रभाग का कवच अविभाजित तथा नालाकार होता है और कैरापेस (Carapace) कहलाता है। इसके खंडों की संख्या का अनुमान इस भाग के साथ जुड़े अवयवों की संख्या से लगाया जाता है। इस भाग में संयुक्त खंडों की संख्या कम से कम छह मानी गई है जिसमें नैत्रिक खंड भी सम्मिलित हैं। इस भाग को सिर कहते हैं। जब इस भाग में इससे अधिक खंड सम्मिलित रहते हैं तब इसके बादवाले खंडों के अवयव अगले अवयवों से पूर्णत: पृथक होते हैं। सिर के पीछे के खंडों को शरीर के दो भागों, वक्ष (Thorax) तथा उदर (Abdomen) में बाँटा गया है, जिनको उनके विभिन्न अवयव एक दूसरे से पृथक करते हैं। परंतु उच्च कठिनी मैलाकाँस्ट्राका (Malacostraca) इत्यादि में वक्ष के खंड सिर में सम्मिलित हो जाते हैं। तब इस संयुक्त भाग को शीर्शोवक्ष (Cephalothorax) के नाम से अभिहित करते हैं। इस प्रकार कैरापेस का रूप भी भिन्न-भिन्न कठिनी जीवों में अनेक प्रकार पाया जाता है। यह ब्रैंकिओपोडा (Branchiopoda) और ऑस्ट्राकोडा (Ostracoda) में बाइवाल्व कवच के रूप में शरीर तथा अंगों को पूर्णतया ढके रहता है, सिरीपीडिया (Cirripedia) में यह मांसल प्रावार के आकार का होता है और इसे पुष्ट करने के लिए कैल्सियमयुक्त (Calcified) पट्ट भी स्थित रहते हैं। ये तो इसके कुछ विशेष रूप हैं, परंतु साधारण नालाकार रूप के कैरापेस में वक्ष के एक से लेकर सारे खंड सिर में सम्मिलित हो सकते हैं। कैरापेस विभिन्न कठिनियों में से प्राय: सभी में पाया जाता है। केवल एनोस्ट्राका (Anostraca) ही जीव हैं जिनमें कैरापेस नहीं होता।

कठिनी के शरीर की संपरिवर्तित चरम सीमा इसके पराश्रयी तथा स्थगित जीवों में पाई जाती है। खंडावर अपनी प्रौढ़ावास्था में अपने सिर से मूलबद्ध रहते हैं और साथ ही उनमें रेडियल सममिति की ओर प्रवृत्ति होती है जिसका कारण इनका स्थगित जीवन है। पराश्रयी जीवों में शरीरखंड लुप्त हो गए हैं और शरीर का आकार भी पूर्ण रूप से परिवर्तित हो गया है। इसका उदाहरण राइज़ोसेफ़ाला (Rhyzocephala) है, जिसमें कठिनी के लक्षण तो क्या, संधिपाद जीवों का भी कोई लक्षण प्रौढावस्था में नहीं दिखाई देता।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 370 |

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