तुम अकडू भी हो और डरपोक भी जब तक तुम्हें पुकारा प्यार से या कभी रो रो के तुमने अपनी अकड़ जारी रखी जहाँ जिसने जरा भी तुम्हें रौब दिखाया और तुम्हारे खेल के सारे भेद खोलने की धमकी दी या कोशिश भर भी की बिना पुकारे दौड़े चले आये यानि जैसे कहा जाता है सीधी ऊंगली से घी नहीं निकलता वैसा ही हाल तुम्हारा है प्यार चिरौरी के तुम लायक नहीं एक घुड़की से ही सीधे हो जाते हो तो भगवन क्या कहूं इसे अब हो न तुम अकडू भी और डरपोक भी सिर्फ खुद को सिद्ध करने को हो जाते हो नतमस्तक तुम्हारे खेल और भेद समझने लगे हैं अब हम भी कहो अब तुम ही कौन सी राह पकडूँ तुम ही निर्णय कर लेना कैसे देना चाहोगे दर्शन मुरारी प्रेम से या फटकार से ?