ग़ालिब की पेंशन  

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मिर्ज़ा ग़ालिब रेखाचित्र (स्कैच)

ग़ालिब उर्दू-फ़ारसी के प्रख्यात कवि तथा महान् शायर थे। मिर्ज़ा ग़ालिब की हालत बहुत ही दयनीय थी। पेंशन का एक मात्र सहारा था। घर में जो कुछ भी था, वह ख़त्म हो गया। यार-दोस्त सब गिरफ़्तार और दूर हो गए। आमदनी के सब रास्ते बन्द थे। क़िले की तनख़्वाह भी पहले ही बन्द हो चुकी थी, क्योंकि वहाँ तो देशी फ़ौज का डेरा था। इतना ही बहुत था कि उन लोगों इनको सताया नहीं, अन्यथा अंग्रेज़ों का ‘वज़ीफ़ाख़ार’ कहकर मौत के घाट उतार देते तो उन्हें कौन रोकने वाला था? अंग्रेज़ों की तरफ़ से जो ख़ानदानी पेंशन मिलती थी, वह भी बन्द हो गई थी, क्योंकि दिल्ली पर देशी फ़ौज का क़ब्ज़ा था।

मिर्ज़ा यूसुफ़ का अन्त

मिर्ज़ा तो बच गए पर इनके भाई मिर्ज़ा यूसुफ़ इतने भाग्यशाली न थे। वह 30 साल की आयु में ही विक्षिप्त (पागल) हो गए थे और ग़ालिब के मकान से दूर, फर्राशख़ाने[1] के क़रीब, एक दूसरे मकान में अलग रहते थे। जितनी पेंशन ग़ालिब को सरकारी ख़ज़ाने से मिलती थी, उतनी ही मिर्ज़ा यूसुफ़ के लिए भी नियत थी। उनकी बीवी, बच्चे भी साथ-साथ रहते थे, पर दिल्ली पर अंग्रेज़ों का फिर से अधिकार हुआ तो गोरों ने चुन-चुनकर बदला लेना शुरू किया। इस बेइज़्ज़ती और अत्याचार से बचने के लिए यूसुफ़ की बीवी बच्चों सहित इन्हें अकेले छोड़कर जयपुर चली गई थीं। घर पर इनके पास एक बूढ़ी नौकरानी और एक बूढ़ा दरवान रह गए। मिर्ज़ा को भी सूचना मिली, किन्तु बेबसी के कारण वह कुछ न कर सके। 30 सितम्बर को जब ग़ालिब को अपना दरवाज़ा बन्द किए हुए पन्द्रह-सोलह दिन हो रहे थे, उन्हें सूचना मिली की सैनिक मिर्ज़ा यूसुफ़ के घर आये और सब कुछ ले गए, लेकिन उन्हें और बूढ़े नौकरों को ज़िन्दा छोड़ गए।[2]
इस समय शहर की हालत भयानक थी। 2-4 आदमियों को मिलकर, किसी लाश को दफ़न करने के लिए क़ब्रिस्तान तक ले जाना सम्भव न था। कफ़न के लिए कपड़े भी न मिलते थे। ख़ैर साथियों ने मदद की। मिर्ज़ा का एक नौकर और पटियाला का एक सिपाही उनके साथ गए। कफ़न के लिए दो-तीन सफ़ेद चादरें मिर्ज़ा ने अपने पास से दीं। इन लोगों ने गली के सिरे पर तहव्वरख़ाँ की मस्जिद की[3] सेहन में गड्डा खोदा और शव को उसमें उतारकर मिट्टी डाल दी।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. वह मकान जिसमें फ़र्श वग़ैरह रखे जाते हैं
  2. ग़ालिब के एक निकट सम्बन्धी मिर्ज़ा मुईनउद्दीन ने लिखा है कि यूसुफ़ गोली की आवाज़ सुनकर, यह देखने के लिए कि क्या हो रहा है, घर से बाहर आये और मारे गए।–ग़दर की सुबह-शाम, पृष्ठ 88
  3. मालिक राम साहब लिखते हैं-फर्राशख़ाने से बावली की तरफ़ जायें तो यह मस्जिद ‘नया बाँस’ के पास उल्टे हाथ को पड़ती है। इसके निर्माणकर्ता तहव्वरख़ाँ ताश्कन्दी मुहम्मदशाह के राज्य काल में शाहजहाँपुर के ज़मींदार थे। वर्तमान मस्जिद नई बनी है। अब इसकी कुर्सी ऊँची है और सेहन के नीचे बाज़ार में दुकानें हैं।
  4. किसी लड़ाई में लड़ते हुए हाथी से गिरकर 1806 ई. में इनका देहान्त हुआ था।
  5. न जाने कैसे, इसके एक मास बाद ही 7 जून, 1806 ई. को, गुप्त रूप से, नवाब अहमदबख़्श ख़ाँ ने अंग्रेज़ सरकार से एक दूसरा आज्ञापत्र प्राप्त कर लिया, जिसमें लिखा था कि, ‘नसरुल्ला बेग ख़ाँ के सम्बन्धियों को 5,000 सालाना पेंशन इस रूप में दी जाए-(1.) ख़्वाजा हाजी (जो कि 50 सवारों के अफ़सर थे)- दो हज़ार सालाना। (2.) नसरुल्ला बेग ख़ाँ की माँ और तीन बहनें-डेढ़ हज़ार सालाना। (3.) मीरज़ा नौशा और मीरज़ा यूसुफ़ (नसरुल्ला बेग के भतीजों) को डेढ़ हज़ार सालाना। इस प्रकार 10 हज़ार से 5 हज़ार हुए और 5 हज़ार से भी सिर्फ़ 750-750 सालाना ग़ालिब और उनके छोटे भाई को मिले।
  6. फ़ारसी और उर्दू पद्य का एक प्रकार जिसमें ग़ज़ल के समान काफ़िया अनिवार्य होता है और जिसमें कोई एक ही बात कही जाती है।
  7. मकातीबे ग़ालिब पृष्ठ 3
  8. फ़ारसी आदि में कविता का एक प्रकार जिसमें किसी बड़े व्यक्ति की प्रशंसा की जाती है।
  9. मकातीबे ग़ालिब पृष्ठ 120
  10. ग़दर में इनका सम्बन्ध बहादुरशाह से छूटा न था। आगरा के अख़बार आफ़ताब आलिमताब में छपा था कि 12 जुलाई, 1857 को मिर्ज़ा नौशा (ग़ालिब) ने बहादुरशाह की तारीफ़ में क़सीदा पढ़ा था। श्रीमालिकराम ने इसे 18 जुलाई लिखा है।
  11. ग़ालिबनामा 145-46
  12. आशा, मंशा, इच्छा
  13. पिता, पितृ, जनक
  14. बुर्ज़ुग
  15. संकल्प, इरादा
  16. पर्यटन, यात्रा
  17. ज़िक्रे ग़ालिब, पृष्ठ 101
  18. मकातीबे ग़ालिब, 82, उर्दू-ए-मोअल्ला 120
  19. मकातीबे ग़ालिब, पृष्ठ 12
  20. उर्दूए-मोअल्ला, पृष्ठ 170

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