ग़ालिब की आर्थिक कठिनाइयाँ  

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ग़ालिब उर्दू-फ़ारसी के प्रख्यात कवि तथा महान् शायर थे। विवाह के बाद ‘ग़ालिब’ की आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ती ही गईं। आगरा, ननिहाल में इनके दिन आराम व रईसीयत से बीतते थे। दिल्ली में भी कुछ दिनों तक रंग रहा। साढ़े सात सौ सालाना पेंशन नवाब अहमदबख़्श ख़ाँ के यहाँ से मिलती थी। वह यों भी कुछ न कुछ देते रहते थे। माँ के यहाँ से भी कभी-कभी कुछ आ जाता था। अलवर से भी कुछ मिल जाता था। इस तरह मज़े में गुज़रती थी। पर शीघ्र ही पासा पलट गया। 1822 ई. में ब्रिटिश सरकार एवं अलवर दरबार की स्वीकृति से नवाब अहमदबख़्श ख़ाँ ने अपनी जायदाद का बँटवारा यों किया, कि उनके बाद फ़ीरोज़पुर झुर्का की गद्दी पर उनके बड़े लड़के शम्सुद्दीन अहमद ख़ाँ बैठे तथा लोहारू की जागीरें उनके दोनों छोटे बेटों अमीनुद्दीन अहमद ख़ाँ और ज़ियाउद्दीन अहमद ख़ाँ को मिले। शम्सुद्दीन अहमद ख़ाँ की माँ बहूख़ानम थीं, और अन्य दोनों की बेगमजान। स्वभावत: दोनों औरतों में प्रतिद्वन्द्विता थी और भाइयों के भी दो गिरोह बन गए। आपस में इनकी पटती नहीं थी। बाद में झगड़ा न हो इस भय से नवाब अहमदबख़्श ख़ाँ ने अपने जीवन काल में ही इस बँटवारे को कार्यान्वित कर दिया और स्वयं एकान्तवास करने लगे। इस प्रकार शम्सुद्दीन अहमद ख़ाँ फ़िरोज़पुर झुर्का के नवाब हो गए और दूसरे दोनों भाइयों को लोहारू का इलाक़ा मिल गया।

ग़ालिब

बँटवारे से प्रभावित

इस बँटवारे से ‘ग़ालिब’ भी प्रभावित हुए। भविष्य के लिए पेंशन नवाब शम्सुद्दीन अहमद ख़ाँ से सम्बद्ध हो गई, जबकि इनका सम्बन्ध अन्य दो भाइयों से अधिक मित्रतापूर्ण था। इसीलिए अब इनकी पेंशन में तरह-तरह के रोड़े अटकाए गए, और अप्रैल 1831 में पेंशन बिल्कुल बन्द कर दी गई। यद्यपि 1835 में चार वर्ष का बकाया पूरे का पूरा मिला। पर बीच में सारी व्यवस्था भंग हो जाने से बड़ा कष्ट हुआ। क़र्ज़ बढ़ा। फिर नवाब अहमदबख़्श ख़ाँ बीच-बीच में कुछ देते रहते थे, वह भी बन्द हो गया, क्योंकि वे बिल्कुल एकान्तवासी हो गए थे और किसी भी मामले में दख़ल नहीं देते थे। ‘ग़ालिब’ की यह हालत देखकर ऋणदाताओं ने भी अपने रुपये माँगना शुरू किया। तक़ाज़ों से इनकी नाक में दम हो गया। इधर यह हाल था, उधर ‘ग़ालिब’ के छोटे भाई मिर्ज़ा यूसुफ़ भरी जवानी (28 वर्ष की आयु में) पागल हो गए। चारों ओर से कठिनाइयाँ एवं मुसीबतें एक साथ उठ खड़ी हुईं और ज़िन्दगी दूभर हो गई।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. यह ख़्वाजा हाजी या उनके पिता ख़्वाजा क़ुतुबउद्दीन ग़ालिब के दादा क़ौक़नबेग ख़ाँ के साथ ही हिन्दुस्तान आए थे। कई लोगों ने उन्हें ‘ग़ालिब’ के वंश का ही बताया है। उनका कहना है कि वह ‘ग़ालिब’ के पूर्व पुरुष तरमस ख़ाँ के छोटे भाई रुस्तम ख़ाँ के वंशज थे। इस विषय में कुछ ठीक-ठीक नहीं कहा जा सकता है। ख़ुद ग़ालिब का तो कहना यह था कि, ‘ख़्वाजा हाजी के पिता मेरे दादा क़ौक़नबेग ख़ाँ का साईस था और उसकी औलाद तीन पुश्त से हमारी नमकख़ार हैं।’ पर सम्भव है कि ‘ग़ालिब’ ने जल-भुनकर ऐसा लिखा हो। इतना तो तय है कि दोनों सम्बन्धी थे, क्योंकि जिस मिर्ज़ा जीवनबेग के पुत्र मिर्ज़ा अकबरबेग से ‘ग़ालिब’ की बहन (मिर्ज़ा नसरुल्ला बेग की भतीजी) छोटी ख़ानम ब्याही थी, उन्हीं जीवनबेग की बेटी अमीरुन्निसा बेगम से ख़्वाजा हाजी की शादी हुई थी।

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