ग़ालिब का अंतिम समय  

ग़ालिब विषय सूची
मिर्ज़ा ग़ालिब का मक़बरा, दिल्ली

ग़ालिब उर्दू-फ़ारसी के प्रख्यात कवि तथा महान् शायर थे। मिर्ज़ा 'ग़ालिब' का ज़िन्दगी भर कर्ज़दारों से पिण्ड नहीं छूट सका। इनके सात बच्चे भी हुए थे, लेकिन जितने भी हुए सब मर गए। 'आरिफ़' (गोद लिया हुआ बेटा) को बेटे की तरह की पाला, वह भी मर गया। पारिवारिक जीवन कभी सुखी एवं प्रेममय नहीं रहा। मानसिक संतुलन की कमी से ज़माने की शिकायत हमेशा रही। इसका दु:ख ही बना रहा कि समाज ने कभी हमारी योग्यता और प्रतिभा की सच्ची क़द्रदानी न की। फिर शराब जो किशोरावस्था में मुँह लगी थी, वह कभी नहीं छूटी। ग़दर के ज़माने में अर्थ-कष्ट, उसके बाद पेंशन की बन्दी। जब इनसे कुछ फुर्सत मिली तो ‘क़ातअ बुरहान’ के हंगामे ने इनके दिल में ऐसी उत्तेजना पैदा की कि बेचैन रखा। इन लगातार मुसीबतों से इनका स्वास्थ्य गिरता ही गया। खाना-पीना बहुत कम हो गया। बहरे हो गए। दृष्टि-शक्ति भी बहुत कम हो गई। क़ब्ज़ की शिकायत पहले से ही थी। मई 1848 में क़ोलज का आक्रमण पहली बार हुआ और बीच-बीच में बराबर आता रहा। 1861 में इतने दर्बल थे कि नवाब रामपुर मुहम्मद यूसुफ़ ख़ाँ ने अपने मझले पुत्र हैदरअली ख़ाँ का निकाह किया और उसमें इन्हें निमंत्रित किया। पर बीमारी एवं दुर्बलता के कारण वहाँ न जा सके।

चर्मरोग से कष्ट

दिन पर दिन स्वास्थ्य ख़राब होता जा रहा था। एक न एक रोग लगे रहते थे। जीवन के उत्तर काल में ख़ून भी ख़राब हो गया। इसके कारण प्राय: चर्मरोग होते रहते थे। इस चर्मरोग से उन्हें बड़ी तकलीफ़ उठानी पड़ी। एक फोड़ा बैठता या पकता कि दूसरा तैयार हो जाता। वर्षों तक यह सिलसिला चलता रहा। इनके पत्रों को पढ़ने से समय की इनकी तकलीफ़ों का कुछ अंदाज़ किया जा सकता है। 3 मई, 1863 को एक पत्र में लिखते हैं कि-
"छठा महीना है कि सीधे हाथ में एक फुंसी ने फोड़े की सूरत पैदा की। फोड़ा पककर फूटा और फूटकर एक ज़ख़्म और ज़ख़्म एक 'ग़ार' (गड्डा, गर्त) बन गया। हिन्दुस्तानी 'जर्राहों' (शल्य चिकित्सक) का इलाज रहा। बिगड़ता गया। दो महीने से काले डाक्टर का इलाज है। सलाइयाँ दौड़ रही हैं; उस्तरे से गोश्त कट रहा है। बीस दिन से इफ़ाक़ा (लाभ) की सूरत नज़र आती है।"

नवम्बर, 1863 में क़ाज़ी अब्दुलजमील को एक ख़त में लिखते हैं कि-
"जितना ख़ून बदन में था, बेमुवालग़ा आधा उसमें से पीप होकर निकल गया।"

फोड़ों से मुक्ति मिली तो 1863 में फ़त्क़[1] की शिकायत हुई। इन शारीरिक व्याधियों में पारिवारिक सौख्य एवं दाम्पत्य स्नेह के अभाव ने ज़िन्दगी को स्वादहीन कर दिया था। जीने की इच्छा नहीं रह गई थी। मृत्यु की आकांक्षा करने लगे थे। जून, 1863 के एक पत्र में लिखते हैं कि-
"सन 1277 हिजरी में मेरा न मरना सिर्फ़ तकज़ीब के वास्ते था। हर रोज़ मर्गे नौ[2] का मज़ा चखता हूँ। रूह मेरी अब जिस्म में इस तरह घबराती है, जिस तरह तायर[3] क़फ़स[4] में। कोई शग़ल, कोई इख़्तिलात,[5] कोई जल्सा, कोई मजमा पसंद नहीं। किताब से नफ़रत, शेर से नफ़रत, जिस्म से नफ़रत, रूह से नफ़रत। जो कुछ लिखा है बेमुबालग़ा और बयाने वाक़अ है।"

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अंत्रवृद्धि, आँत उतरने
  2. नवमरण
  3. पक्षी
  4. पिंजरे
  5. प्रेम व्यवहार
  6. स्त्री
  7. सच्चा, वास्तविक
  8. पीड़ितों
  9. दुआ देने वाला, शुभ चिंतक
  10. मित्र, दोस्त
  11. ध्यान, विचार
  12. दास, सेवक
  13. पक्षाघात, लकवा

संबंधित लेख

और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=ग़ालिब_का_अंतिम_समय&oldid=597614" से लिया गया