माथा कुँवर मन्दिर कुशीनगर  

माथा कुँवर का मन्दिर उत्तर प्रदेश के इतिहास प्रसिद्ध कुशीनगर में है। यह मन्दिर 'परिनिर्वाण मन्दिर' से दक्षिण-पश्चिम दिशा में एक फलांग चलने पर मिलता है। इस स्थान के विषय में यह माना जाता है कि यहीं बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया था। मन्दिर एक स्वतंत्र रचना न होकर एक बड़े विहार का अंग था। यह विहार 114 फुट (34.75 मीटर) चौकोर क्षेत्र में विस्तृत था। यहाँ उत्खनन से भगवान बुद्ध के जीवन की घटनाओं से संबद्ध 10वीं-11वीं शताब्दी की मिट्टी की मुहरें भी मिली हैं।

बुद्ध की प्रतिमा

इस स्थान का उत्खनन कार्य कार्लाइल ने किया था। यहीं पर बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया था। इसके खंडहरों को आजकल 'माथा कुँवर कोट' के नाम से जाना जाता है।[1] इस मन्दिर में भूमि मुद्रा में बुद्ध की 3.05 मीटर ऊँची विशाल प्रतिमा स्थापित थी। यह गया के काले पत्थर से निर्मित थी। इस मूर्ति की पादपीठिका पर 11वीं शताब्दी का एक लेख है। इससे आभास होता है कि यह मूर्ति मन्दिर में स्थापित रही होगी।[2] इस मूर्ति को जनरल कनिंघम ने 1861 ई. में पाया था। कालांतर में 1876 ई. में कार्लाइल ने इस मन्दिर का उत्खनन कराया। पुन: 1911 की खुदाई में इसका प्राचीन सिंहासन भी मिल गया। इस मूर्ति की मरम्मत कराने के बाद उसे पुन: पुराने स्थान पर स्थापित कर दिया गया और 1927 ई. में इसी स्थान पर वर्तमान मन्दिर का निर्माण किया गया।

संरचना

परवर्ती उत्खननों से अब यह प्राय: निश्चित हो गया है कि उपर्युक्त मन्दिर एक स्वतंत्र रचना न होकर एक बड़े विहार का अंग था। यह विहार 114 फुट (34.75 मीटर) चौकोर क्षेत्र में विस्तृत था। इसमें 13.41 मीटर वर्गाकार आँगन और 2.59 मीटर चौड़े गलियारे बने थे। इस पूर्वाभिमुख विहार में आँगन के चारों ओर कमरे बने हुए थे। पश्चिमी किनारे पर बीच में बने एक कमरे में उपर्युक्त मूर्ति स्थापित थी। उत्खनन से बुद्ध के जीवन की घटनाओं से संबद्ध 10वीं-11वीं शताब्दी की मिट्टी की मुहरें मिली हैं। कार्लाइल को इसी काल का एक शिलापट्ट[3] भी मिला था, जिससे इसके कलचुरी वंश के किसी स्थानीय शासक [4] द्वारा बनवाए जाने की पुष्टि होती है।

यहाँ से उत्खनन में मुख्य स्तूप और निर्वाण मन्दिर के चारों ओर फैले अनेक सहायक मठ मिले हैं। इस वर्ग के चारों ओर बनी एक दीवार से इसकी पुष्टि होती है। टूटी ईंटों से निर्मित 14.5687 हेक्टेयर असमान चतुर्भुज क्षेत्रफल में विस्तृत यह दीवार पूर्णत: भूमि के अंदर छिपी हुई थी। इसकी प्रत्येक भुजा 381 मीटर लंबी थी।[5]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ए. कनिंघम, दि ऐंश्येंट् ज्योग्राफी आफ इंडिया (इंडोलाजिकल बुक हाउस, वाराणसी, 1963), पृ. 364
  2. देबला मित्रा, बुद्धिस्ट मानुमेंट्स, पृ. 71
  3. उद्धृत अभिलेख, वी.वी. मिराशी, ‘इंसक्रिप्शंस आफ दी चेदि कलचुरि एरा’, प्लेट दो, कार्पस् इंसक्रिप्सनम् इंडिकेरम, भाग 4 (ऊटकसंड, 1955), पृ. 375 और आगे।
  4. संभवत: भीम द्वितीय
  5. स्मरणीय है कि इस विहार का निर्माण परवर्ती होने के कारण इससे भी निश्चित होता है कि चीनी यात्रियों के यात्रा विवरणों में इसका कोई उल्लेख नहीं मिलता।

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