कुमारलात  

कुमारलात प्रथम शताब्दी के पूर्वार्ध में बौद्ध आचार्य थे। भोट देशीय परम्परा कुमारलात का जन्म स्थान पश्चिम भारत निर्दिष्ट करती है। बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद चौथे-पाँचवें शतक में प्राय: सभी निकाय विभिन्न स्थानों में वृद्धिगत एवं पुष्ट होते हुए बुद्ध शासन का प्रचार-प्रसार करते दृष्टिगोचर होते हैं।

जन्म

दक्षिण भारत में प्राय: स्थविरों का बाहुल्य और प्राबल्य था। मथुरा से लेकर मगध पर्यन्त मध्य प्रदेश में सर्वास्तिवादियों का अधिक प्रचार था। भारत के पश्चिमी भाग में जालन्धर से लेकर कश्मीर और गांधार पर्यन्त सर्वास्तिवादी और सौत्रान्तिकों का विशेष प्रभाव था। इसी समय आचार्य कुमारलात का जन्म हुआ। विविध ग्रन्थों में कुमारलात के नाम में कुछ-कुछ परिवर्तन दृष्टिगोचर होते हैं, यथा- 'कुमारलात', 'कुमारलाभ', 'कुमारलब्ध' और 'कुमाररत' आदि।

फ़ाह्यान का कथन

भारत आने वाले प्रसिद्ध चीनी यात्री फ़ाह्यान और हुएन-सांग दोनों का कहना है कि आचार्य का जन्म स्थान तक्षशिला था। हुएन-सांग कुमारलात के बारे में निम्न विवरण प्रस्तुत करता है-

तक्षशिला से लगभग 12-13 'ली' की दूरी पर महाराज अशोक ने एक स्तूप का निर्माण कराया था। यह वही स्थान है, जहाँ पर बोधिसत्त्व चन्द्रप्रभ ने अपने शरीर का दान किया था। स्तूप के समीप एक संघाराम है, जो भग्नावस्था में दिखाई देता है। उसी संघाराम में कुछ भिक्षु निवास करते हैं। इसी स्थान पर बैठकर (निवास करते हुए) 'सौत्रान्तिक दर्शन' सम्प्रदाय के अनुयायी कुमारलब्ध शास्त्री ने प्राचीन काल में कुछ ग्रन्थों की रचना की थी। अन्य इतिहासज्ञ भी तक्षशिला को आचार्य का जन्म स्थान कहते हैं।

एक अन्य स्थान पर हुएन-सांग का पुन: यह कहना है कि-

कुमारलात ने तक्षशिला में निवास किया। बचपन से ही वे विलक्षण प्रतिभा से सम्पन्न थे। कम उम्र में ही वे विरक्त होकर प्रव्रजित हो गये थे। उनका सारा समय पवित्र ग्रन्थों के अवलोकन में तथा अध्यात्म चिन्तन में व्यतीत होता था। वे प्रतिदिन 32000 शब्दों का स्वाध्याय और उतने ही का लेखन करते थे। अपने साथियों और सहाध्यायियों में उनकी विलक्षण योग्यता की प्राय: चर्चा होती थी। उनकी कीर्ति सर्वत्र व्याप्त हो गई थी। सद्धर्म के सिद्धान्तों को उन्होंने लोक में निर्दोष निरूपित किया और अनेक विधर्मी तैर्थिकों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। शास्त्रार्थ कला में उनके विलक्षण चातुर्य की लोक में चर्चा होती थी। शास्त्र सम्बन्धी ऐसी कोई कठिनाई नहीं थी, जिसका उचित समाधान करने में वे सक्षम न हों। सारे भारत के विभिन्न भागों से जिज्ञासु लोग उनके दर्शनार्थ आते रहते थे और उनका सम्मान करते थे। उन्होंने लगभग 20 ग्रन्थों की रचना की। ये ही 'सौत्रान्तिक दर्शन' प्रस्थान के प्रतिष्ठापक थे।

इन विवरणों से ज्ञात होता है कि आचार्य कुमारलात पश्चिम भारत में तक्षशिला महाविहार में पण्डित पद पर प्रतिष्ठत थे। उनके अध्ययन-अध्यापन की कीर्ति विस्तृत रूप से फैली हुई थी। भोट देशीय परम्परा भी इस मत की समर्थक है। चीनी यात्री हुएन-सांग के मत का अनुसरण करते हुए प्राय: इतिहास-विशेषज्ञ स्थविर कुमारलात को ही 'सौत्रान्तिक दर्शन' का प्रवर्तक निरूपित करते हैं। कुमारलात 'सौत्रान्तिक दर्शन' के प्रथम प्रवर्तक आचार्य नहीं थे, अपितु आचार्य परम्परा के क्रम में उनका स्थान तृतीय है। शास्त्र नैपुण्य और गम्भीर ज्ञान की दृष्टि से उनका स्थान प्रथम हो सकता है, किन्तु काल की दृष्टि से वे प्रथम थे- विभिन्न साक्ष्यों के आधार पर ऐसा नहीं माना जा सकता हैं।

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