त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ  

त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ
त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ
वर्णन त्रिपुरा स्थित 'त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ' भारतवर्ष के अज्ञात 108 एवं ज्ञात 51 पीठों में से एक है। इसका हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व है।
स्थान राधा किशोर ग्राँव, त्रिपुरा
देवी-देवता सती 'त्रिपुर सुंदरी' तथा शिव 'त्रिपुरेश'।
संबंधित लेख शक्तिपीठ, सती
पौराणिक मान्यता मान्यतानुसार यह माना जाता है कि इस स्थान पर देवी सती का 'दक्षिण पाद'[1] गिरा था।
अन्य जानकारी इस पीठ स्थान को 'कूर्भपीठ' भी कहते हैं। मंदिर का प्रांगण कूर्म[2] की तरह है तथा मंदिर में लाल-काली कास्टिक पत्थर की बनी माँ महाकाली की भी मूर्ति है।

त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ हिन्दू धर्म में प्रसिद्ध 51 शक्तिपीठों में से एक है। हिन्दू धर्म के पुराणों के अनुसार जहाँ-जहाँ माता सती के अंग के टुकड़े, धारण किये हुए वस्त्र और आभूषण गिरे, वहाँ-वहाँ पर शक्तिपीठ अस्तित्व में आये। इन शक्तिपीठों का धार्मिक दृष्टि से बड़ा ही महत्त्व है। ये अत्यंत पावन तीर्थस्थान कहलाते हैं। ये तीर्थ पूरे भारतीय उप-महाद्वीप में फैले हुए हैं। 'देवीपुराण' में 51 शक्तिपीठों का वर्णन है। 'त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ' इन्हीं 51 शक्तिपीठों में से एक है।

चार ज़िलों- 'धालाई', 'उत्तरी त्रिपुरा', 'दक्षिणी त्रिपुरा' और 'पश्चिमी त्रिपुरा' वाला भारत का अति लघु प्रदेश त्रिपुरा बांग्लादेश से घिरा है। पूर्वोत्तर में एक सँकरी पट्टी है, जहाँ त्रिपुरा की सीमा असम तथा मिज़ोरम से मिलती है। इन चार ज़िलों के मुख्यालय हैं- धालाई का मुख्यालय 'अम्बासा', उत्तरी त्रिपुरा का मुख्यालय 'कैलास शहर', दक्षिणी त्रिपुरा का मुख्यालय 'उदयपुर' और पश्चिमी त्रिपुरा का मुख्यालय 'अगरतला', जो त्रिपुरा राज्य की राजधानी भी है। त्रिपुरा का क्षेत्रफल मात्र 10491 वर्ग किलोमीटर है। इसकी पुरानी राजधानी उदयपुर ही थी।

स्थिति

उल्लेखनीय है कि महाविद्या समुदाय में त्रिपुरा[3] नाम की अनेक देवियाँ हैं[4], जिनमें त्रिपुरा-भैरवी, त्रिपुरा और त्रिपुर सुंदरी विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। देवी त्रिपुरसुंदरी ब्रह्मस्वरूपा हैं, भुवनेश्वरी विश्वमोहिनी हैं। वही परदेवता, महाविद्या, त्रिपुरसुंदरी, ललिताम्बा आदि अनेक नामों से स्मरण की जाती हैं। त्रिपुरसुंदरी का शक्ति-संप्रदाय में असाधारण महत्त्व है। इन्हीं के नाम पर सीमांत प्रदेश भारत के पूर्वोत्तर भाग में 'त्रिपुरा राज्य' नाम से स्थापित है। कुछ का यह कथन है कि त्रिपुरी भाषा के दो शब्द 'तुर्ड' तथा 'प्रा' पर इस राज्य का नाम पड़ा है, जिसका संयुक्त रूप से अर्थ होता है- 'पानी के पास।' दक्षिणी-त्रिपुरा उदयपुर शहर से तीन किलोमीटर दूर, राधा किशोर ग्राम में राज-राजेश्वरी त्रिपुर सुन्दरी का भव्य मंदिर स्थित है, जो उदयपुर शहर के दक्षिण-पश्चिम[5] में पड़ता है। यहाँ सती के दक्षिण 'पाद'[6] का निपात हुआ था। यहाँ की शक्ति 'त्रिपुर सुंदरी' तथा शिव 'त्रिपुरेश' हैं। इस पीठ स्थान को 'कूर्भपीठ' भी कहते हैं। इस मंदिर का प्रांगण कूर्म[7] की तरह है तथा इस मंदिर में लाल-काली कास्टिक पत्थर की बनी माँ महाकाली की भी मूर्ति है। इसके अतिरिक्त आधा मीटर ऊँची एक छोटी मूर्ति भी है, जिसे माता कहते हैं। उनकी भी महिमा माँ काली की तरह है। कहते हैं कि त्रिपुरा-नरेश शिकार हेतु या युद्ध पर प्रस्थान करते समय इन्हें अपने साथ रखते थे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. पैर
  2. कछुवे
  3. श्री कामराज विद्या की अधिष्ठात्र श्री विद्या का ही नामांतर त्रिपुरा है। 'त्रि' अर्थात् 'तीन या त्रिमूर्तियों से', 'पुरा' 'पुरातन' होने से त्रिपुरा यानी गुणत्रयातीता त्रिगुणानियंत्री शक्ति। तंत्र ग्रंथ त्रिपुरार्णव में त्रिपुरा की निरुक्ति है-तीन नाड़ियाँ (इड़ा, पिंगला, सुषुम्ना)। वह मन, बुद्धि एवं चित्त रूपी तीन पुरों में वास करने वाली शक्ति हैं। प्रकारांतर में त्रिपुरा की निरुक्ति है-त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर शिव) की जननी होने से, त्रयी (ऋक्, साम, यजु,) वेदमयी होने से, महाप्रलय की त्रिलोकी को अपने में लीन करने से जगदम्बा 'श्री विद्या' ही त्रिपुरा हैं। इच्छा-शक्ति उनका शिरोभाग है, ज्ञान-शक्ति मध्य भाग है तथा क्रियाशक्ति अधोभाग है, इसी से शक्ति-त्रयात्मक होने से वह त्रिपुरा कही जाती हैं।
  4. श्री विद्यार्णव (भाग-2)
  5. नैऋत्यकोण
  6. पैर
  7. कछुवे

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