अंगांगिभाव  

अंगांगिभाव - संज्ञा पुल्लिंग (संस्कृत अङ्गाङ्गिभाव)[1]

  1. अवयव और अवयवी का परस्पर संबंध। उपकारक उपकार्य-संबंध। अंश का संपूर्ण के साथ आश्रय और आश्रयी रूप संबंध अर्थात ऐसा संबंध कि उस अंश का अवयव के बिना संपूर्ण वा अवयवी की सिद्धि न हो; जैसे, त्रिभुज की एक भुजा का सारे त्रिभुज के साथ संबंध।
  2. गौण और मुख्य का परस्पर संबंध।
  3. अलंकार में संकर का एक भेद। जहाँ एक ही पद्य में कुछ अलंकार प्रधान रूप से आएं और उनके आश्रय या उपकार से दूसरे और भी आ जाएं।
उदाहरण

"अब ही तो दिन दस बीते नाहि नाह चले अब उठि आई वह कहाँ लौं बिसरिहै। आओ खेलें चौसर बिसारैं मतिराम दुख, खेलन को आई जानि विरह को चूरि है। खेलत ही काहू कह्यो जुग जिन फूटौ प्यारी। न्यारी भई सारी को निबाह होनो दूर है। पासे दिए डारि मन साँसे ही में बूड़ि रह्यो बिसर्यो न दुख, दुख दूनो भरपूर है।" यहाँ 'जुग जनि फूटौ' वाक्य के कारण प्रिय का स्मरण हो आया। इससे स्मरण अलंकार और इस स्मरण के कारण विरहनिवृत्ति के साधन से उलटा दुःख हुआ अर्थात् 'विषम' अलंकार की सिद्धि हुई। अतः यहाँ स्मृति अलंकार विषम का अंग है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिंदी शब्दसागर, प्रथम भाग |लेखक: श्यामसुंदरदास बी. ए. |प्रकाशक: नागरी मुद्रण, वाराणसी |पृष्ठ संख्या: 08 |

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