अंगराग  

अंगराग शरीर के विभिन्न अंगों का सौंदर्य अथवा मोहकता बढ़ाने के लिए या उनको स्वच्छ रखने के लिए शरीर पर लगाई जाने वाली वस्तुओं को अंगराग (कॉस्मेटिक) कहते हैं, परंतु साबुन की गणना अंगरागों में नहीं की जाती।

सौंदर्य प्रसाधन

इतिहास__सभ्यता के प्रादुर्भाव से ही मनुष्य स्वभावत: अपने शरीर के अंगों को शुद्ध, स्वस्थ, सुडौल और सुंदर तथा त्वचा को सुकोमल, मृदु, दीप्तिमान और कांतियुक्त रखने के लिए सतत प्रयत्नशील रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि शारीरिक स्वास्थ्य और सौंदर्य प्राय: मनुष्य के आंतरिक स्वास्थ्य और मानसिक शुद्धि पर निर्भर है। तथापि, यह सत्य है कि किसी के व्यक्तित्व को आकर्षक और सर्वप्रिय बनाने में अंगराग और सुगंध विशेष रूप से सहायक होते हैं। संसार के विभिन्न देशों के साहित्य और सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि भिन्न-भिन्न अवसरों पर प्रगतिशील नागरिकों द्वारा अंगराग और गंध शास्त्र संबंधी कलाओं का उपयोग शारीरिक स्वास्थ्य और त्वचा की सौंदर्य वृद्धि के लिए किया जाता रहा है।

भारत युगयुगांतर से धर्म प्रधान देश रहा है। इसलिए अंगराग और सुगंध की रचना और उपयोग को मनुष्य की तामसिक वासनाओं का उत्तेजक न मानकर समाज कल्याण और धर्म प्रेरणा का साधन समझा जाता रहा है। आर्य संस्कृति में अंगराग और गंध शास्त्र का महत्व प्रत्येक सद्गृहस्थ के दैनिक जीवन में उतना ही आवश्यक रहा है जितना पंच महायज्ञ और वर्णाश्रम धर्म की मर्यादा का पालन। वैदिक साहित्य, महाभारत, बृहत्संहिता, निघंटु, सुश्रुत, अग्निपुराण, मार्कंडेयपुराण, शुक्रनीति, कौटिल्य अर्थशास्त्र, शार्ड्ग़़धर पद्धति, वात्स्यायन कामसूत्र, ललित विस्तर, भरत नाट्यशास्त्र, अमरकोश इत्यादि में नानाविध अंगरागों और गंध द्रव्यों का रचनात्मक और प्रयोगात्मक वर्णन पाया जाता है। सद्गोपाल और पी.के. गोडे के अनुसंघानों के अनुसार इन ग्रंथों में शरीर के विविध प्रसाधनों में से विशेषतया दर्पण की निर्माण कला, अनेक प्रकार के उद्वर्तन, विलेप, धूलन, चूर्ण, पराग, तैल, दीपवर्ति, धूपवर्ति, गंधोदक, स्नानीय चूर्णवास, मुखवास इत्यादि का विस्तृत विधान किया गया है। गंगाधरकृत गंधसार नामक ग्रंथ के अनुसार तत्कालीन भारत में अंगरागों के निर्माण में मुख्यतया निम्नलिखित छह प्रकार की विधियों का प्रयोग किया जाता था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सं. ग्रं. - एडबर्ड सैगेरिन द्वारा संपादित कॉस्मेटिक्स सायंस ऐंड टेक्नॉलॉजी, न्यूयॉर्क, 1957; मेसन जी.डी. नवर्रे: दि केमिस्ट्री ऐंड मैन्युफ़ैक्चर ऑव कॉस्मेटिक्स, न्यूयॉर्क, 1946; ई.जी. टॉमसन; मॉडर्न कॉस्मेटिक्स, न्यूयार्क, 1947; डब्ल्यू.ए. पोशे: परफ्यूम्स, कॉस्मेटिक्स ऐंड सोप्स, ३ भाग, लंदन, 1941; राल्फ जी. हैरी: मॉडर्न कॉस्मेटिकॉलॉजी, दो भाग, लंदन, 1944; ए. ई. हैकल: दि ब्यूटीकल्चर हैंडबुक, 1935; एवरेट जी. मैकडनफ़: ट्रुथ अबाउट कॉस्मेटिक्स, न्यूयार्क: गिल्बर्ट बेल: ए हिस्ट्री ऑव कॉस्मेटिक्स इन अमरीका, न्यूयार्क, 1947; अज्ञात: टेकनीक ऑव ब्यूटी प्रॉडक्ट्स, लंदन, 1949; हेयर ड्रेसिंग ऐंड ब्यूटी कल्चर, लंदन, 1948। (क. और स.)
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