अंगराग  

अंगराग - संज्ञा पुल्लिंग (संस्कृत अङ्गराग)[1]

  1. चंदन, केसर, कपूर, कस्तूरी आदि सुगंधित द्रव्यों का मिला लेप, जो अंग में लगाया जाता है, उबटन।
  2. वस्त्र और आभूषण
  3. शरीर की शोभा के लिये महावर आदि रंगने की सामग्री।
  4. स्त्रियों के शरीर के अंगों की सजावट-मांग में सिंदूर, माथे में रोली, गाल पर तिल की रचना, केसर का लेप और हाथ-पैर में मेहंदी व महावर।
  5. एक प्रकार की सुगंधित देसी बुकनी, जिसे मुँह पर लगाते हैं।
  6. चौंसठ कलाओं में से एक।[2]


अंगराग शरीर के विभिन्न अंगों का सौंदर्य अथवा मोहकता बढ़ाने के लिए या उनको स्वच्छ रखने के लिए शरीर पर लगाई जाने वाली वस्तुओं को अंगराग (कॉस्मेटिक) कहते हैं, परंतु साबुन की गणना अंगरागों में नहीं की जाती।

सौंदर्य प्रसाधन

इतिहास__सभ्यता के प्रादुर्भाव से ही मनुष्य स्वभावत: अपने शरीर के अंगों को शुद्ध, स्वस्थ, सुडौल और सुंदर तथा त्वचा को सुकोमल, मृदु, दीप्तिमान और कांतियुक्त रखने के लिए सतत प्रयत्नशील रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि शारीरिक स्वास्थ्य और सौंदर्य प्राय: मनुष्य के आंतरिक स्वास्थ्य और मानसिक शुद्धि पर निर्भर है। तथापि, यह सत्य है कि किसी के व्यक्तित्व को आकर्षक और सर्वप्रिय बनाने में अंगराग और सुगंध विशेष रूप से सहायक होते हैं। संसार के विभिन्न देशों के साहित्य और सांस्कृतिक इतिहास के अध्ययन से पता चलता है कि भिन्न-भिन्न अवसरों पर प्रगतिशील नागरिकों द्वारा अंगराग और गंध शास्त्र संबंधी कलाओं का उपयोग शारीरिक स्वास्थ्य और त्वचा की सौंदर्य वृद्धि के लिए किया जाता रहा है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिंदी शब्दसागर, प्रथम भाग |लेखक: श्यामसुंदरदास बी. ए. |प्रकाशक: नागरी मुद्रण, वाराणसी |पृष्ठ संख्या: 07 |
  2. वर्णरत्नाकर
  3. सं. ग्रं. - एडबर्ड सैगेरिन द्वारा संपादित कॉस्मेटिक्स सायंस ऐंड टेक्नॉलॉजी, न्यूयॉर्क, 1957; मेसन जी.डी. नवर्रे: दि केमिस्ट्री ऐंड मैन्युफ़ैक्चर ऑव कॉस्मेटिक्स, न्यूयॉर्क, 1946; ई.जी. टॉमसन; मॉडर्न कॉस्मेटिक्स, न्यूयार्क, 1947; डब्ल्यू.ए. पोशे: परफ्यूम्स, कॉस्मेटिक्स ऐंड सोप्स, ३ भाग, लंदन, 1941; राल्फ जी. हैरी: मॉडर्न कॉस्मेटिकॉलॉजी, दो भाग, लंदन, 1944; ए. ई. हैकल: दि ब्यूटीकल्चर हैंडबुक, 1935; एवरेट जी. मैकडनफ़: ट्रुथ अबाउट कॉस्मेटिक्स, न्यूयार्क: गिल्बर्ट बेल: ए हिस्ट्री ऑव कॉस्मेटिक्स इन अमरीका, न्यूयार्क, 1947; अज्ञात: टेकनीक ऑव ब्यूटी प्रॉडक्ट्स, लंदन, 1949; हेयर ड्रेसिंग ऐंड ब्यूटी कल्चर, लंदन, 1948। (क. और स.)

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