वंक्षु  

वंक्षु 'ऑक्सस' या आसू नदी (दक्षिण रूस) का प्राचीन नाम था। इस नदी का उल्लेख महाभारत, सभापर्व[1] में हुआ है-

'प्रमाणरागसंपन्नान् वंक्षुतीरसमुद्भवान्, बल्यर्थ दबतस्तस्मै हिरण्यं रजतं बहु।
  • उपरोक्त प्रसंग में युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ में वंक्षु नदी प्रदेश के निवासियों द्वारा भेंट में लाए गये तेज़ दौड़ने वाले 'रासभों'[2] का भी उल्लेख है।
  • 'रघुवंश'[3] में 'सिंधुतीर विचेष्टनैः'[4] के स्थान में किसी-किसी प्राचीन प्रति में 'वंक्षुतीर विचेष्टनै:, पाठ है। यदि यह शुद्ध है तो कालिदास के समय में वंक्षु नदी के प्रदेश को भारत के सम्राट अपने साम्राज्य का ही एक अंग समझते थे, इस तथ्य को मान्यता प्रदान करनी पड़ेगी।[5]
  • वंक्षु का रूपांतर साहित्य में 'वक्षु' या 'चक्षु' भी मिलता है।
  • अरबी भाषा में इस नदी को 'जिहून' कहते हैं।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. सभापर्व 50,20
  2. 'रासभान् दूरपातिः', महाभारत, सभापर्व 50,19
  3. रघुवंश 4, 67
  4. 'विनीताध्व श्रमास्तस्य सिंधुतीरविचेश्टनैः, दुधुर्वुजिन: स्कन्धाँल्लग्नकुंकुमकेसरान्
  5. ऐतिहासिक स्थानावली |लेखक: विजयेन्द्र कुमार माथुर |प्रकाशक: राजस्थान हिन्दी ग्रंथ अकादमी, जयपुर |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 826 |

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