मुग़ल काल 2  

अफ़ग़ान

अफ़ग़ान यद्यपि हार गये थे, लेकिन उन्होंने मुग़ल शासन को स्वीकार नहीं किया था। पूर्वी उत्तर प्रदेश अब भी अफ़ग़ान सरदारों के हाथ में था। जिन्होंने बाबर की अधीनता को स्वीकार तो कर लिया था, लेकिन उसे कभी भी उखाड़ फैंकने को तैयार थे। अफ़ग़ान सरदारों की पीठ पर बंगाल का सुल्तान नुसरत शाह था, जो इब्राहिम लोदी का दामाद था। अफ़ग़ान सरदारों ने कई बार पूर्वी उत्तर प्रदेश से मुग़ल कर्मचारियों को निकाल बाहर किया था और स्वयं कन्नौज पहुँच गये थे। परन्तु उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी सर्वमान्य नेता का अभाव था। कुछ समय पश्चात् इब्राहिम लोदी का भाई महमूद लोदी, जो खानवा में बाबर से लड़ चुका था, अफ़ग़ानों के निमन्त्रण पर बिहार पहुँचा। अफ़ग़ानों ने उसे अपना सुल्तान मान लिया और उसके नेतृत्व में इकट्ठे हो गये।

यह ऐसा ख़तरा था जिसको बाबर नज़रअन्दाज़ नहीं कर सकता था। अतः 1529 के शुरू में उसने आगरा से पूर्व की ओर प्रस्थान किया। बनारस के निकट गंगा पार करके घाघरा नदी के निकट उसने अफ़ग़ानों और बंगाल के नुसरत शाह की सम्मिलित सेना का सामना किया। हालांकि बाबर ने नदी को पार कर लिया और अफ़ग़ान तथा बंगाली सेनाओं को लौटन पर मजबूर कर दिया, पर वह निर्णायक युद्ध नहीं जीत सका। मध्य एशिया की स्थिति से परेशान और बीमार बाबर ने अफ़ग़ानों के साथ समझौता करने का निर्णय कर लिया। उसने बिहार पर अपने आधिपत्य का एक अस्पष्ट सा दावा किया, लेकिन अधिकांश अफ़ग़ान सरदारों के हाथ में छोड़ दिया। उसके बाद बाबर आगरा लौट गया। कुछ ही समय बाद, जब वह क़ाबुल जा रहा था, वह लाहौर के निकट मर गया।

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