औरंगज़ेब तथा दक्कन के राज्य  

औरंगज़ेब तथा दक्कन के राज्य (1658-87)

दक्कन राज्यों के साथ मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के सम्बन्धों को तीन चरणों में विभक्त किया जा सकता है। 'पहला चरण' 1668 ई. तक था, जिसके दौरान मुग़लों का प्रमुख लक्ष्य अहमदनगर राज्य के उन क्षेत्रों को भी बीजापुर से वापस लेना था, जो 1636 ई. की संधि के अंतर्गत बीजापुर को मिल गये थे। 'दूसरा चरण' 1684 ई. तक चला, जिसके दौरान दक्कन में सबसे अधिक ख़तरा मराठों को समझा गया और मुग़लों ने शिवाजी तथा उसके पुत्र शम्भाजी के ख़िलाफ़ बीजापुर तथा गोलकुण्डा को अपने पक्ष में मिलाने के प्रयास किये। साथ ही मुग़लों ने दक्कन के राज्यों के क्षेत्रों पर भी हमले शुरू किये और उन्हें पूरी तरह मुग़लों के अधीन लाने का प्रयत्न किया। 'अंतिम चरण' उस समय शुरू हुआ जब मराठों के ख़िलाफ़ बीजापुर तथा गोलकुण्डा का सहयोग हासिल करने से निराश होकर औरंगज़ेब ने बीजापुर तथा गोलकुण्डा को ही पूरी तरह अपने क़ब्ज़े में करने का निश्चय किया।

प्रथम चरण (1658-1668 ई.)

1636 की संधि के अंतर्गत मराठों के ख़िलाफ़ बीजापुर तथा गोलकुण्डा के समर्थन को प्राप्त करने के लिए शाहजहाँ ने रिश्वत के रूप में अहमदनगर राज्य के एक तिहाई क्षेत्र को उन्हें देने के अलावा यह वचन दिया था कि वह कभी भी बीजापुर तथा गोलकुण्डा पर क़ब्ज़ा नहीं करेगा। लेकिन इस नीति का शाहजहाँ ने स्वयं ही त्याग कर दिया। 1657-58 में गोलकुण्डा तथा बीजापुर के राज्यों को मिटा देने की धमकी दी गई। गोलकुण्डा को बहुत बड़ा हर्जाना देना पड़ा तथा बीजापुर को 1636 में मिले निज़ामशाही क्षेत्रों को समर्पित करना पड़ा। मुग़लों ने इस कार्य को इस आधार पर उचित ठहराया कि बीजापुर तथा गोलकुण्डा ने कर्नाटक के विस्तृत क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा कर लिया था और वे इसके लिए मुग़लों को हर्जाना देने पर इसलिए बाध्य थे, क्योंकि ये दोनों राज्य मुग़लों के अधीन थे तथा उनकी विजय मुग़लों की तटस्थता के कारण ही सम्भव हो सकी थी। इसके अलावा दक्कन में मुग़ल सेना का खर्चा बहुत अधिक था और दक्कन के राज्यों से प्राप्त राशि इसके लिए पूरी नहीं पड़ती थी। बहुत समय तक यह खर्चा मालवा तथा गुजरात के ख़ज़ाने की राशि से पूरा किया जाता रहा।

औरंगज़ेब की आंशिक सफलता

दक्कन में सीमित रूप से आगे बढ़ने की मुग़लों की नीति के दूरगामी प्रभाव पड़े, जिसे न तो शाहजहाँ और न ही औरंगज़ेब उस समय पूरी तरह समझ सके। इस नीति के कारण हमेशा के लिए मुग़लों की संधियाँ तथा उनके वायदों के प्रति अविश्वास हो गया और इसके कारण मुग़ल, मराठों के विरुद्ध अन्य शक्तियों को संगठित नहीं कर सके। औरंगज़ेब ने 25 वर्षों तक इस नीति की सफलता के लिए प्रयास किए, लेकिन उसे विशेष सफलता नहीं मिली।

दक्कन की समस्याएँ

औरंगज़ेब के सम्राट बनने के समय दक्कन में कई समस्याएँ उसके सामने सिर उठाये खड़ी थीं। इनमें से दो समस्याएँ बहुत ही महत्त्वपूर्ण थीं-

  1. मराठा छत्रपति शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति
  2. बीजापुर को इस बात के लिए राज़ी करना कि वह 1636 की संधि के अंतर्गत प्राप्त क्षेत्रों को मुग़लों को वापस कर दे।

1657 में कल्याणी तथा बीदर को वापस ले लिया गया। 1660 में रिश्वत देकर परंदा भी हासिल कर लिया गया। लेकिन शोलापुर अभी भी बचा था। औरंगज़ेब ने यह आशा की थी कि इन प्रतिकूल परिस्थितियों से बाध्य होकर आदिलशाह शिवाजी के विरुद्ध मुग़लों के अभियान में सहर्ष ही साथ देगा। पर यह आशा ग़लत साबित हुई। 1636 में शिवाजी के विरुद्ध आदिलशाह का समर्थन प्राप्त करने के लिए शाहजहाँ ने उसे बहुत बड़ी रिश्वत दी थी। औरंगज़ेब आदिलशाह को 1636 में प्राप्त क्षेत्रों के अलावा और कुछ दे भी नहीं सकता था। इसके विपरीत औरंगज़ेब ने आदिलशाह द्वारा अपनाये गये असहयोग के रवैये से क्रोधित होकर शिवाजी तथा आदिलशाह दोनों को सबक़ सिखाने के लिए राजा जयसिंह को दक्कन भेज दिया।

इससे स्पष्ट है कि औरंगज़ेब को मुग़ल सेना की शक्ति तथा अपने विरोधियों की कमज़ोरी पर पूरा भरोसा था। लेकिन जयसिंह बहुत कुशल कूटनीतिज्ञ था। उसने औरंगज़ेब से कहा "इन दोनों मूर्खों पर एक साथ हमला करना मेरी नासमझी होगी।" उस समय जयसिंह ही अकेला मुग़ल राजनीतिज्ञ था, जिसने दक्कन में पूरी तरह आगे बढ़ने की नीति का समर्थन किया। जयसिंह का विश्वास था कि दक्कन में बिना पूर्ण आक्रामक नीति के मराठों की समस्या नहीं सुलझाई जा सकती। औरंगज़ेब इसी निष्कर्ष पर बीस वर्ष बाद पहुँचा।

जयसिंह की असफलता तथा मृत्यु

बीजापुर के विरुद्ध अभियान की तैयारी करते समय जयसिंह ने औरंगज़ेब को लिखा था- "बीजापुर विजय सारे दक्कन तथा कर्नाटक के विजय की भूमिका है।" लेकिन औरंगज़ेब इतना साहसपूर्ण क़दम उठाने से हिचकिचा रहा था। उसके कारणों का केवल अंदाज़ा लगाया जा सकता हैं। उस समय उत्तर पश्चिम में ईरान के शासक का ख़तरा बना हुआ था। उधर दक्कन का अभियान बड़ा लम्बा तथा कठिन होता और वहाँ सम्राट को स्वयं रहना पड़ता, क्योंकि इतनी बड़ी सेना किसी सरदार या किसी राजकुमार के नेतृत्व में नहीं छोड़ी जा सकती थी। महत्वाकांक्षी शाहजहाँ ने इस बात को अनुभव किया था और इसलिए जब तक शाहजहाँ जीवित था, औरंगज़ेब किसी दूर के अभियान पर कैसे जा सकता था।

सीमित साधनों के कारण जयसिंह के बीजापुर अभियान (1665) को असफल होना ही था। इस अभियान के कारण दक्कन के राज्य मुग़लों के ख़िलाफ़ संगठित हो गये और क़ुतुबशाह ने बीजापुर की सहायता के लिए एक बड़ी सेना भेजी। दक्कन के राज्यों ने छापामार नीति अपनाई। उन्होंने जयसिंह को बीजापुर के दूर-दराज़ क्षेत्रों में आक्रमण करने दिया, ताकि मुग़लों को वहाँ बाद में कोई रसद प्राप्त न हो सके। जब जयसिंह को महसूस हुआ कि वह शहर पर हमला नहीं कर सकता था, क्योंकि वह अपने साथ बड़ी तोपों को नहीं लाया था और शहर की घेराबंदी असम्भव थी। पीछे लौटना भी उसे बड़ा मंहगा पड़ा। जयसिंह के इस अभियान से मुग़लों को न तो धन और न ही किसी क्षेत्र की प्राप्ति हो सकी। इस निराशा तथा औरंगज़ेब की नाराज़गी के कारण ही जयसिंह की 1667 ई. अकाल मृत्यु हो गई। इसके अगले वर्ष 1668 में मुग़लों ने रिश्वत देकर शोलापुर को हासिल कर लिया और इस प्रकार प्रथम चरण समाप्त हुआ।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अर्थात् मुग़ल
  2. कहा जाता है कि औरंगज़ेब ने साहू को इस शर्त पर राज लौटाना स्वीकार किया था कि वह मुसलमान हो जाएगा, लेकिन तात्कालिक वृत्तान्त इस बात का समर्थन नहीं करते। अगर औरंगज़ेब साहू को मुसलमान बनाना चाहता था तो यह वह उस समय कर सकता था, जब साहू 13 वर्षों तक उसका बंदी रहा था।

संबंधित लेख


और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=औरंगज़ेब_तथा_दक्कन_के_राज्य&oldid=612798" से लिया गया