मुग़लकालीन शिक्षा एवं साहित्य  

मुग़लकालीन शासकों ने अपने शासनकाल में शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए बहुत कार्य किया। इन शासकों ने अपने राज्य में शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण योगदान किया था। इस समय की मस्जिदों में ‘मकतब’ की व्यवस्था होती थी, जिसमें लड़के-लड़कियाँ प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण करते थे। बाबर के समय में एक विभाग ‘शुहरते आम’ होता था, जो स्कूल-कॉलेजों का निर्माण करवाता था।

मुग़ल शासकों का योगदान

हुमायूँ ज्योतिष एवं भूगोल का ज्ञाता था। उसने दिल्ली के पुराने क़िले के ‘शेर मण्डल’ नाम के हाल में अपने व्यक्तिगत पुस्तकालय की स्थापना की थी। हुमायूँ को पुस्तकों में बड़ी रुचि थी। वह सदैव अपने साथ एक चुना हुआ पुस्तकालय लेकर चलता था। हुमायूँ द्वारा ईरान से भारत वापस आने के उपरांत भारी संख्या में ईरानी प्रवासियों का भारत में आगमन हुआ, जिन्हें भारत में उपर्युक्त साहित्यिक वातावरण प्राप्त हुआ, जो उन्हें ईरान में प्राप्त नहीं था। उन्होंने भारतीय साहित्यिक मनीषियों के साथ एक पृथक् भारतीय शैली 'सबक-ए-हिन्दी' का विकास किया। श्लेष, तिथिबन्ध व्यंग, मूल उपमाएँ तथा प्रत्यय आदि इस शैली की प्रमुख विशेषताएँ थीं।

शिक्षा के क्षेत्र में अकबर द्वारा किया गया प्रयास निःसंदेह स्मरणीय है। बदायूंनी के अनुसार अकबर ने गुजरात को जीतने के बाद अपने पुस्तकालय को अनेक दुर्लभ पुस्तकों से भर दिया। उसने एक अनुवाद विभाग की स्थापना की। अकबर के पुस्तकालय की प्रशंसा में स्मिथ ने कहा कि, 'अकबर का पुस्तकालय उस काल व उसके पूर्व के काल का अद्वितीय पुस्तकालय था'। इसके अतिरिक्त अकबर ने फ़तेहपुर सीकरी, आगरा एवं अन्य अनेक स्थानों पर अनेक 'ख़ानक़ाह' (आश्रम) एवं 'मदरसों' (पाठशाला) की स्थापना की। अकबर की उपमाता माहम अनगा ने दिल्ली में 'खैरूल मनाजित' नाम से एक मदरसा स्थापित किया था। फ़तेहपुर सीकरी मुस्लिम शिक्षा का मुख्य केन्द्र था। अकबर के समय फ़तेहपुरी सीकरी में अब्दुल कादिर शेख़, फ़ैज़ी, निज़ामुद्दीन जैसे विद्वान् रहते थे।

अकबर का शासन काल भारत में फ़ारसी साहित्य के ‘पुनर्जागरण’ का काल था। ‘आइना-ए-अकबरी’ में अकबर के राजदरबार के 59 महान् फ़ारसी कवियों के नाम मिलते हैं। अकबर का राजकवि 'अबुल फ़ैज़ी', अमीर ख़ुसरो से लेकर मुग़ल युग तक के भारतीय फ़ारसी साहित्य का महानतम कवि था। 'अब्बास ख़ान सरवानी' ने अकबर के आदेश पर 'तोहफ़ा-ए-अकबरशाही' की रचना की थी। इस पुस्तक में शेरशाह सूरी के कार्यकलापों को उजागर करने की भरपूर कोशिश की गई है।

जहाँगीर को फ़ारसी एवं तुर्की भाषा का अच्छा ज्ञान था। उसने अपने काल में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन की घोषणा की, जिसके अनुसार यदि कोई सम्पन्न व्यक्ति बिना किसी उत्तराधिकारी के मर जाता है तो, उसकी संपत्ति राज्य लेकर उससे मदरसे और मठों का निर्माण व मरम्मत करवायेगा। शाहजहाँ ने दिल्ली में एक कॉलेज का निर्माण एवं ‘दार्रुल बका’ नामक कॉलेज की मरम्मत करायी। मुग़ल राजपरिवार का सर्वाधिक विद्वान् दारा शिकोह था, उसने श्रीमद्भागवदगीता, योगवशिष्ठ, उपनिषद एवं रामायण का अनुवाद फ़ारसी में करवाया था। उसने ‘सीर-ए-अकबर’ (महान रहस्य) नाम से 52 उपनिषदों का अनुवाद कराया था।

मुग़ल काल में राजकुमारियाँ, रानियाँ एवं उच्च घरानों की लड़कियाँ भी शिक्षा प्राप्त करती थीं, जिनमें प्रसिद्ध थीं- 'गुलबदन बेगम' (बाबर की पुत्री), फ़ारसी पद्य लेखिका 'सलीमा सुल्तान' (हुमायूँ की भतीजी), नूरजहाँ, मुमताज़ महल, जहाँआरा, जेबुन्निसा, दुर्गावती, चाँद बीबी आदि। अकबर की माँ ने पुराने क़िले में ‘खेर-दल-मंज़िल’ नामक मदरसे की स्थापना करवायी थी।

मुग़ल काल में शिक्षा के प्रमुख केन्द्र

मुग़ल काल में शिक्षा के महत्त्वपूर्ण केन्द्र के रूप में आगरा, फ़तेहपुर सीकरी, दिल्ली, गुजरात, लाहौर, सियालकोट, जौनपुर, अजमेर आदि विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। मुग़ल काल के शासकों ने ‘फ़ारसी’ को अपनी राजभाषा बनाया था। इस काल का फ़ारसी साहित्य काफ़ी समृद्ध था। फ़ारसी के अतिरिक्त हिन्दी, संस्कृत, उर्दू का भी मुग़ल काल में विकास हुआ।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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