ज्वारसिद्धांत  

ज्वारसिद्धांत की उत्पत्ति के संबंध में वैज्ञानिकों ने अनेक सिद्धांत प्रस्तुत किए हैं। 1916 ई. में जींज़[1] एवं जेफ्रीज़[2] नामक प्रख्यात गणितज्ञों ने इस विषय पर एक सिद्धांत प्रतिपादित किया था। उनके इस सिद्धांत को ज्वारभाटीय सिद्धांत कहते हैं।[3]

  • जींज़ एवं जेफ्रीज़ के मतानुसार एक विशाल तारा, जो सूर्य से कई गुना बड़ा था, अकस्मात सूर्य के समीप से गुजरा। उसके गुरुत्वाकर्षण के कारण सूर्य तल पर ऊँचे ज्वार उठने लगे। जब वह अपने पथ पर बढ़ता हुआ सूर्य की निकटतम स्थिति में पहुँचा तो सूर्यतल पर ऊँचे-उँचे ज्वार का एक भाग, जो चंचु के आकार का था, सूर्य से विलग हो गया, किंतु वह उस तारे तक नहीं पहुँच पाया। तारा तीव्र गति से एक दिशा में अग्रसर हो रहा था और कुछ ही समय में बहुत दूर निकल गया।
  • सूर्य से विलग हुई उस चंच्वाकार वस्तु में उस गतिमान तारे एवं सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के मिश्रित प्रभाव से कोणात्मक संवेग[4] उत्पन्न हुआ, जिसके परिणामस्वरूप वह वस्तु सूर्य की परिक्रमा करने लगी। कालांतर में वह चंच्वाकार वस्तु कई भागों में खंडित हो गई, जिससे विभिन्न ग्रहों का निर्माण हुआ।
  • इन ग्रहों के लब्धांशों ने उपग्रहों का रूप धारण किया, जो निज ग्रहों की परिक्रमा करने लगे। चूँकि वह चंचु बीच में दोनों छोरों की अपेक्षा अधिक विस्तृत था, इसीलिए देखा जाता है कि मध्यस्थ ग्रह आकार में अधिक बड़े हैं और दोनों ओर का आकार छोटा है। उस चंचु के मध्य स्थित पदार्थ से बृहस्पति तथा शनि जैसे विशाल ग्रहों की उत्पत्ति हुई है।


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. Jeans
  2. Jeffries
  3. ज्वारसिद्धांत (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 05 जून, 2014।
  4. angular momentum

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