जाके लिए घर आई घिघाय, करी मनुहारि उती तुम गाढ़ी। आजु लखैं उहिं जात उतै, न रही सुरत्यौ उर यौं रति बाढ़ी॥ ता छिन तैं तिहिं भाँति अजौं, न हलै न चलै बिधि की लसी काढ़ी। वाहि गँवा छिनु वाही गली तिनु, वैसैहीं चाह (बै) वैसेही ठाढ़ी॥