गोविंदस्वामी  

दीक्षा तथा गोवर्धन निवास

गोविंदस्वामी गानविद्या के आचार्य थे। काव्‍य एवं संगीत का पूर्ण रूप से उन्‍हें ज्ञान था। गोसाईं विट्ठलनाथ जी उनकी भक्ति-निष्‍ठा और संगीत-माधुरी से परिचित थे। यद्यपि दोनों का साक्षात्‍कार नहीं हुआ था तो भी दोनों एक दूसरे की ओर आकृष्‍ट थे। गोविंदस्‍वामी ने श्रीविट्ठलनाथ जी से संवत 1592 विक्रमी में गोकुल आकर ब्रह्मसम्‍बन्‍ध ले लिया। उनके परम कृपापात्र और भक्त हो गये। गोसाईं जी ने कर्म और भक्ति का तात्विक विवेचन किया। उनकी कृपा से वे गोविंदस्‍वामी से 'गोविंददास' हो गये। उन्‍होंने गोवर्धन को ही अपना स्‍थायी निवास स्थिर किया। गोवर्धन के निकट कदम्‍ब वृक्षों की एक मनोरम वाटिका में वे रहने लगे। वह स्‍थान 'गोविंददास की कदमखण्‍डी' नाम से प्रसिद्ध है।

ब्रज महिमा का बखान

गोविंददास सरस पदों की रचना करके श्रीनाथ जी की सेवा करते थे। ब्रज के प्रति उनका दृढ़ अनुराग और प्रगाढ़ आसक्ति थी। उन्‍होंने ब्रज की महिमा का बड़े सुन्‍दर ढंग से बखान किया है। वे कहते हैं- "वैकुण्‍ठ जाकर क्‍या होगा, न तो वहां कलिन्दगिरिनन्दिनी तट को चूमने वाली सलोनी लतिकाओं की शीतल और मनोरम छाया है, न भगवान श्रीकृष्‍ण की मधुर वंशीध्‍वनि की रसालता है, न तो वहां नन्द-यशोदा हैं और न उनके चिदानन्‍दघनमूर्ति श्‍यामसुन्‍दर हैं, न तो वहां ब्रजरज है, न प्रेमोन्‍मत्‍त राधारानी के चरणारविन्‍द-मकरन्‍द का रसास्‍वादन है।"

संबंधित लेख

और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=गोविंदस्वामी&oldid=549970" से लिया गया