लाचित बोड़फुकन  

लाचित बोड़फुकन
लाचित बोड़फुकन
पूरा नाम लाचित बोड़फुकन
मृत्यु असम
अभिभावक पिता- मोमाई तामुली बोड़बरुआ
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र अहोम सेनापति
प्रसिद्धि वीर योद्धा
विशेष लाचित बोड़फुकन के पराक्रम और सराईघाट की लड़ाई में असमिया सेना की विजय का स्मरण करने के लिए संपूर्ण असम में प्रति वर्ष 24 नवम्बर को 'लाचित दिवस' मनाया जाता है।
अन्य जानकारी लाचित बोड़फुकन का कोई प्रामाणिक चित्र उपलब्ध नहीं है, लेकिन एक पुराना इतिवृत्त उनका वर्णन इस प्रकार करता है, "उनका मुख चौड़ा है और पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह दिखाई देता है। कोई भी उनके चेहरे की ओर आँख उठाकर नहीं देख सकता।"

लाचित बोड़फुकन (अंग्रेज़ी: Lachit Borphukan) का नाम असम के इतिहास में बड़ा ही महत्त्वपूर्ण है। इन्हें अपनी वीरता और कुशल नेतृत्व क्षमता के लिए याद किया जाता है। लाचित अहोम साम्राज्य के सेनापति और बोड़फुकन थे। सराईघाट की लड़ाई (1671 ई.) में इन्होंने बेहतरीन सूझबूझ का परिचय दिया था। इन्होंने कामरूप पर पुनः अधिकार प्राप्त करने के लिए रामसिंह प्रथम के नेतृत्व वाली मुग़ल सेनाओं का प्रयास विफल कर दिया गया था।

परिचय

लाचित बोड़फुकन, मोमाई तामुली बोड़बरुआ के पुत्र थे, जो कि प्रताप सिंह के शासन-काल में पहले बोड़बरुआ[1] थे। लाचित बोड़फुकन ने मानविकी, शास्त्र और सैन्य कौशल की शिक्षा प्राप्त की थी। उन्हें अहोम स्वर्गदेव के ध्वज वाहक[2] का पद सौंपा गया था, जो कि किसी महत्वाकांक्षी कूटनीतिज्ञ या राजनेता के लिए पहला महत्वपूर्ण कदम माना जाता था। बोड़फुकन के रूप में अपनी नियुक्ति से पूर्व लाचित अहोम राजा चक्रध्वज सिंह की शाही घुड़साल के अधीक्षक, रणनैतिक रूप से महत्वपूर्ण सिमुलगढ़ किले के प्रमुख और शाही घुड़सवार रक्षक दल के अधीक्षक[3] के पदों पर आसीन रहे थे।

राजा चक्रध्वज ने गुवाहाटी के शासक मुग़लों के विरुद्ध अभियान में सेना का नेतृत्व करने के लिए लाचित बोड़फुकन का चयन किया। राजा ने उपहारस्वरूप लाचित को सोने की मूठ वाली एक तलवार और विशिष्टता के प्रतीक पारंपरिक वस्त्र प्रदान किए थे। लाचित ने सेना एकत्रित की और 1667 ई. की गर्मियों तक तैयारियां पूरी कर लीं गईं। लाचित ने मुग़लों के कब्ज़े से गुवाहाटी को पुनः प्राप्त कर लिया और सराईघाट की लड़ाई में वे इसकी रक्षा करने में सफल रहे। सराईघाट की विजय के लगभग एक वर्ष बाद प्राकृतिक कारणों से लाचित बोड़फुकन की मृत्यु हो गई। उनका मृत शरीर जोरहाट से 16 किमी दूर हूलुंगपारा में स्वर्गदेव उदयादित्य सिंह द्वारा सन 1672 में निर्मित लचित स्मारक में विश्राम कर रहा है। लाचित बोड़फुकन का कोई चित्र उपलब्ध नहीं है, लेकिन एक पुराना इतिवृत्त उनका वर्णन इस प्रकार करता है, "उनका मुख चौड़ा है और पूर्णिमा के चंद्रमा की तरह दिखाई देता है। कोई भी उनके चेहरे की ओर आँख उठाकर नहीं देख सकता।"

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ऊपरी असम के राज्यपाल और अहोम सेना के मुख्य सेनापति
  2. सोलधर बरुआ
  3. या दोलकक्षारिया बरुआ

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