तैमूर लंग  

तैमूर लंग
तैमूर
पूरा नाम तैमूर लंग
जन्म 1336 ई.
जन्म भूमि उज्बेकिस्तान
मृत्यु तिथि 18 फ़रवरी सन् 1405 ई.
मृत्यु स्थान कज़ाख़िस्तान
शासन काल 1369 ई. - 1405 ई.
शा. अवधि 36 वर्ष
धार्मिक मान्यता इस्लाम
वंश तैमूरी राजवंश
अन्य जानकारी मध्य एशिया में होकर जितने भी भाग्य-परीक्षक और विजेता गुज़रे हैं, उनमें से चार के नाम लोगों को अभी तक याद हैं- सिकन्दर, सुल्तान महमूद, चंगेज़ ख़ाँ और तैमूर।

तैमूर लंग अथवा 'तैमूर' [शुद्ध शब्द 'तिमुर' है, जिसका अरबी भाषा में अर्थ है- लोहा][1] (1336 ई. - 1405 ई.) चौदहवीं शताब्दी का एक शासक था जिसने महान् तैमूरी राजवंश की स्थापना की थी। तैमूर 1369 ई. में समरकंद के अमीर के रूप में अपने पिता के सिंहासन पर बैठा और इसके बाद ही विश्व-विजय के लिए निकल पड़ा। मेसोपोटामिया, फ़ारस और अफ़ग़ानिस्तान को विजित कर 1398 ई. में उसने अपनी विशाल अश्व सेना के साथ भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली तक बढ़ आया। मार्ग में उसने सहस्रों लोगों की हत्या की और बहुत से नगरों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। उसने दिल्ली के निकट सुल्तान महमूद तुग़लक़ की विशाल सेना को निर्णायक रूप से परास्त कर दिया और 18 दिसंबर 1398 ई. को दिल्ली के अंदर प्रवेश किया। उसके सैनिकों ने कई दिनों तक राजधानी की लूटपाट की। दिल्ली में वह केवल 15 दिन रुका, फिर हज़ारों छकड़ों पर लूट का माल लादकर अपने वतन वापस लौट गया। मार्च 1398 ई. में उसकी सेना सिंधु के जिन-जिन इलाकों से होकर गुजरी, वहाँ अराजकता, अकाल और महामारी फैल गयी। उसके आक्रमण से दिल्ली सल्तनत की जड़ें हिल गयीं और उसका शीघ्र ही पतन हो गया।[2]

बर्बर व्यक्तित्व

चंगेज़ ख़ाँ और उसके मंगोल भी बेरहम और बरबादी करने वाले थे, पर वे अपने ज़माने के दूसरे लोगों की तरह ही थे। लेकिन तैमूर उनसे बहुत ही बुरा था। अनियंत्रित और पैशाचिक क्रूरता में उसका मुक़ाबला करने वाला कोई दूसरा नहीं था। कहते हैं, एक जगह उसने दो हज़ार ज़िन्दा आदमियों की एक मीनार बनवाई और उन्हें ईंट और गारे में चुनवा दिया। 'तैमूर लंग' दूसरा चंगेज़ ख़ाँ बनना चाहता था। वह चंगेज़ का वंशज होने का दावा करता था, लेकिन असल में वह तुर्क था। वह लंगड़ा था, इसलिए 'तैमूर लंग' कहलाता था। वह अपने बाप के बाद सन 1369 ई. में समरकंद का शासक बना। इसके बाद ही उसने अपनी विजय और क्रूरता की यात्रा शुरू की। वह बहुत बड़ा सिपहसलार था, लेकिन पूरा वहशी भी था। मध्य एशिया के मंगोल लोग इस बीच में मुसलमान हो चुके थे और तैमूर खुद भी मुसलमान था। लेकिन मुसलमानों से पाला पड़ने पर वह उनके साथ जरा भी मुलामियत नहीं बरतता था। जहाँ-जहाँ वह पहुँचा, उसने तबाही और बला और पूरी मुसीबत फैला दी। नर-मुंडों के बड़े-बड़े ढेर लगवाने में उसे ख़ास मजा आता था। पूर्व में दिल्ली से लगाकर पश्चिम में एशिया-कोचक तक उसने लाखों आदमी क़त्ल कर डाले और उनके कटे सिरों को स्तूपों की शक़्ल में जमवाया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. पुस्तक- उर्दू हिन्दी शब्दकोश | पृष्ठ संख्या- 297
  2. पुस्तक- भारतीय इतिहास कोश | पृष्ठ संख्या- 192

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