राजपूत काल  

राजपूतों के इतिहास के बारे में अभिलेखों एवं समकालीन तथा बाद के कुछ साहित्यों से जानकारी मिलती है। अभिलेखों में ग्वालियर एवं ऐहोल अभिलेख तथा साहित्य में नयचन्द्रसूरि का 'हम्मीर महाकाव्य', पद्मगुप्त का 'नवसाहसांकचरित', हलायुध की 'पिंगलसूत्रवृति', 'कुमारपाल चरित', 'वर्ण रत्नाकार' एवं पृथ्वीराजरासो आदि प्रमुख है।

राजपूत का अर्थ

राजपूत शब्द संस्कृत के 'राजपूत्र' का अपभ्रंश है। सामान्यत: इसका अर्थ होता है, 'राजा का पुत्र' या शाही परिवार के किसी व्यक्ति का 'राजपूत्र'। सम्भवतः प्राचीन काल में इस शब्द का प्रयोग किसी जाति के रूप में न करके राजपरिवार के सदस्यों के लिए किया जाता था, पर हर्ष की मृत्यु के बाद राजपूत या राजपूत्र शब्द का प्रयोग जाति के रूप में होने लगा।

राजपूतों की उत्पत्ति

इन राजपूत वंशों की उत्पत्ति के विषय में विद्धानों के दो मत प्रचलित हैं- एक का मानना है कि राजपूतों की उत्पत्ति विदेशी है, जबकि दूसरे का मानना है कि, राजपूतों की उत्पत्ति भारतीय है। हर्षवर्धन की मृत्यु के उपरान्त जिन महान् शक्तियों का उदय हुआ था, उनमें अधिकांश राजपूत वर्ग के अन्तर्गत ही आते थे।ऐजेन्ट टोड ने 12वीं शताब्दी के उत्तर भारत के इतिहास को 'राजपूत काल' भी कहा है। कुछ इतिहासकारों ने प्राचीन काल एवं मध्य काल को 'संधि काल' भी कहा है। इस काल के महत्त्वपूर्ण राजपूत वंशों में राष्ट्रकूट वंश, चालुक्य वंश, चौहान वंश, चंदेल वंश, परमार वंश एवं गहड़वाल वंश आदि आते हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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