दो बीघा ज़मीन  

दो बीघा ज़मीन
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निर्देशक बिमल रॉय
निर्माता बिमल रॉय
लेखक सलिल चौधरी (कहानी), पॉल महेन्द्र (हिन्दी वार्ता), ऋषिकेश मुखर्जी (परिदृश्य)
कलाकार बलराज साहनी, निरुपा राय, रतन कुमार, मुराद, राजलक्ष्मी
प्रसिद्ध चरित्र शम्भु
संगीत सलिल चौधरी
गीतकार शैलेन्द्र
गायक लता मंगेशकर, मुहम्मद रफ़ी और मन्ना डे
प्रसिद्ध गीत आजा री आ निंदिया तू आ
छायांकन कमल बोस
संपादन ऋषिकेश मुखर्जी
वितरक शीमारो वीडियो प्राइवेट लिमिटेड
प्रदर्शन तिथि 1953
अवधि 142 मिनट
भाषा हिन्दी
पुरस्कार फ़िल्मफ़ेयर- सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार; सामाजिक प्रगति के लिए पुरस्कार
अन्य जानकारी फ़िल्म का नाम 'दो बीघा ज़मीन' रवींद्रनाथ टैगोर की इसी नाम की कविता से रखा गया था। फ़िल्म के कथानक के हिसाब से भी इससे उपयुक्त नाम दूसरा नहीं था।

दो बीघा ज़मीन (अंग्रेज़ी: Do Bigha Zameen) 1953 में बनी प्रसिद्ध हिन्दी फ़िल्म है। यह प्रसिद्ध फ़िल्म निर्देशक बिमल रॉय द्वारा निर्देशित है। बलराज साहनी और निरुपा रॉय ने इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाई। फ़िल्म के विषय में कहा जाता है कि यह एक समाजवादी फ़िल्म है और भारत के समानांतर सिनेमा के प्रारंभ में महत्त्वपूर्ण फ़िल्मों में से एक है। इस फ़िल्म से संगीतकार सलिल चौधरी थे। 'दो बीघा ज़मीन' की कहानी सलिल चौधरी ने ही लिखी थी। भारतीय किसानों की दुर्दशा पर केन्द्रित इस फ़िल्म को हिन्दी की महानतम फ़िल्मों में गिना जाता है। इटली के नव यथार्थवादी सिनेमा से प्रेरित विमल दा की दो बीघा ज़मीन एक ऐसे ग़रीब किसान की कहानी है जो शहर चला जाता है। शहर आकर वह रिक्शा खींचकर रुपये कमाता है ताकि वह रेहन पड़ी ज़मीन को छुड़ा सके। ग़रीब किसान और रिक्शा चालक की भूमिका में बलराज साहनी ने बेहतरीन अभिनय किया है। व्यावसायिक तौर पर 'दो बीघा ज़मीन' भले ही कुछ ख़ास सफल नहीं रही लेकिन इस फ़िल्म ने विमल दा की अंतर्राष्ट्रीय पहचान स्थापित कर दी। इस फ़िल्म के लिए उन्होंने कांस फ़िल्म महोत्सव और कार्लोवी वैरी फ़िल्म समारोह में पुरस्कार जीता। इस फ़िल्म ने हिन्दी सिनेमा में विमल राय के पैर जमा दिये। 'दो बीघा ज़मीन' के लिए बिमल राय को सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का पहला फ़िल्म फ़ेयर अवार्ड दिया गया।

कथावस्तु

कहानी में शम्भु किसान (बलराज साहनी), उसकी पत्नी पारो (निरुपा राय) व पुत्र कन्हैया (रतन कुमार) मुख्य पात्र है। फ़िल्म की कहानी में गाँव में भयानक अकाल पड़ने के बाद बारिश होती है जिससे सभी खुश हो जाते हैं। गाँव का ज़मींदार हरमन सिंह शहर के ठेकेदार से गाँव में ज़मीन बेचने का सौदा कर लेता है। वह शम्भु, (जो दो बीघा ज़मीन का मालिक है) से भी ज़मीन बेचने के लिए कहता है।

दो बीघा ज़मीन
Do Bigha Zamin

हरमन सिंह को बहुत विश्वास था कि वह शम्भु की ज़मीन ख़रीद लेगा। शम्भु ने ज़मींदार से कई बार पैसा उधार लिया था जिसे वह चुका नहीं पाया था। हरमन सिंह ने शम्भु से उस ऋण के बदले में अपनी ज़मीन देने के लिए कहा। शम्भु ने उसे अपनी ज़मीन देने से मना कर दिया क्योंकि वह ज़मीन उसकी जीविका थी। हरमन सिंह दुखी हो गया। हरमन सिंह ने अगले ही दिन शम्भु से उधार लिया पैसा चुकाने के लिए कहा। शम्भु वापस आकर अपने पिता व बेटे की सहायता से ऋण की रकम 65 रुपये निकालता है। शम्भु अपने घर का सब कुछ बेचकर पैसों की व्यवस्था करता है और पैसे चुकाने ज़मींदार के पास जाता है। वहाँ शम्भु यह जानकर हैरान हो जाता है कि ऋण कि राशि 235 रुपये है। लेखाकर से हुई भूल को निपटाने के लिए शम्भु अदालत जाता है व लेखाकार से हुई भूल को बताता है। वहाँ शम्भु मुक़दमा हार जाता है। अदालत फैसला सुनाता है कि शम्भु तीन महीने के अन्दर अपना ऋण चुका दे अन्यथा उसकी ज़मीन की नीलामी कर दी जायेगी।

मुराद (हरमन सिंह) और बलराज साहनी (शम्भु)
Murad (Harman Singh) And Balraj Sahni (Shambhu)

शम्भु पैसा वापस करने के लिए कलकत्ता जाता है वहाँ वह एक रिक्शा चालक बन जाता है तथा उसका बेटा कन्हैया एक मोची बन जाता है। तीन महीने बीत जाते हैं। ऋण चुकाने का दिन क़रीब आने पर शम्भु ज़्यादा पैसा कमाने के लिए बहुत तेजी से रिक्शा खींचता है। रिक्शा से पहिया निकल जाता है व शम्भु की दुर्घटना हो जाती है। अपने पिता की हालत को देखकर कन्हैया चोरी करना चालू कर देता है। जब शम्भु को कन्हैया के बारे में पता चलता है तो वह उसे बहुत बुरा-भला कहता है। इधर शम्भु की पत्नी को शम्भु और कन्हैया के बारे में सोचकर चिन्ता होती है। वह उन दोनों को ढूढ़ने के लिए शहर आ जाती है वहाँ उसका कार से दुर्घटना हो जाती है। शम्भु सारा जमा किया हुआ पैसा उसके इलाज में लगा देता है। गाँव में शम्भु की ज़मीन की नीलामी हो जाती है क्योंकि शम्भु पैसा चुकाने में असमर्थ हो जाता है। ज़मीन ज़मींदार हरमन सिंह के पास चली जाती है और वहाँ कारख़ाने का काम चालू हो जाता है। शम्भु और उसका परिवार गाँव में अपनी ज़मीन देखने आता है। वहाँ ज़मीन की जगह कारख़ाना देखकर बहुत दुखी हो जाता है तथा मुठ्ठी भर गंदगी कारख़ाने पर फैंकता है। वहाँ कारख़ाने के सुरक्षा कर्मी उसे बाहर निकाल देते हैं। फ़िल्म खत्म हो जाती है तथा शम्भु व उसका परिवार वहाँ से चला जाता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. कुशल कलाकार (हिन्दी) (एच.टी.एम) अभिव्यक्ति। अभिगमन तिथि: 1 सितंबर, 2010
  2. खत्री, ठाकुरदास। किसान-समाज का सशक्त मानवीय चित्रण (हिन्दी) डेली न्यूज़। अभिगमन तिथि: 31 जनवरी, 2015।

बाहरी कड़ियाँ

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