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सौदागर (1991 फ़िल्म) - भारतकोश, ज्ञान का हिन्दी महासागर

सौदागर (1991 फ़िल्म)  

सौदागर (1991 फ़िल्म)
सौदागर फ़िल्म का पोस्टर
निर्देशक सुभाष घई
निर्माता अशोक घई, सुभाष घई
लेखक सचिन भोमिक, सुभाई घई, कमलेश पाण्डेय
संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल
प्रसिद्ध गीत 'ईलू-ईलू', 'इमली का बूटा', 'सौदागर सौदा कर' आदि।
प्रदर्शन तिथि 9 अगस्त, 1991
अवधि 213 मिनट
भाषा हिन्दी
संबंधित लेख दिलीप कुमार, अमरीश पुरी
देश भारत
अन्य जानकारी अभिनय से दूरी बना चुके राजकुमार और दिलीप कुमार ने काफ़ी लम्बे समय के बाद फ़िल्मी पर्दे पर वापसी 'सौदागर' के माध्यम से की थी। इससे पूर्व इन दोनों अभिनेताओं ने फ़िल्म 'पैगाम' में एक साथ काम किया था।

सौदागर वर्ष 1991 में प्रदर्शित भारतीय सिनेमा के दो ख्याति प्राप्त अभिनेताओं दिलीप कुमार और राजकुमार के अभिनय से सजी हिन्दी फ़िल्म है। यह फ़िल्म अपने समय की सुपरहिट फ़िल्मों में गिनी जाती है, जिसने कई कीर्तिमान स्थापित किये थे। अभिनय से दूरी बना चुके राजकुमार और दिलीप कुमार ने काफ़ी लम्बे समय के बाद फ़िल्मी पर्दे पर वापसी 'सौदागर' के माध्यम से की थी। इससे पूर्व इन दोनों अभिनेताओं ने फ़िल्म 'पैगाम' में एक साथ काम किया था। फ़िल्म के अन्य मुख्य कलाकारों में विवेक मुशरान, मनीषा कोइराला, अमरीश पुरी, अनुपम खैर, दीप्ति नवल, मुकेश खन्ना आदि ने अभिनय किया था। इस फ़िल्म का गीत 'ईलू-ईलू' आज भी दर्शकों द्वारा पसन्द किया जाता है।

कहानी

बाल्यावस्था के जिगरी दोस्त अपनी दोस्ती को शत्रुता में परिणित कर एक दूसरे को देखना भी नहीं चाहते, लेकिन प्रौढ़ावस्था उनको एक दोराहे पर लाकर खड़ा कर देती है। दोस्ती और शत्रुता की इसी कहानी को फ़िल्म 'सौदागर' का केंद्र बनाया गया है। बचपन के घनिष्ठ मित्र वीर सिंह ('वीरू' - दिलीप कुमार) तथा राजेश्वर सिंह ('राजू' - राजकुमार), जिनकी दोस्ती कभी एक आदर्श दोस्ती थी, खलनायक चुनिया (अमरीश पुरी) की कुटिल चाल का शिकार हो जाती है, जिससे दोनों जिगरी दोस्त आपस में परस्पर घृणा करने लगते हैं और कट्टर शत्रु बन जाते हैं।

दोनों दोस्तों की शत्रुता इस सीमा तक बढ़ जाती है कि दोनों अपने गाँव के रास्तों की सीमायें भी निश्चित कर लेते हैं और उनका उल्लंघन करने पर मौत के घाट उतार देने की शपथ लेते है। लेकिन होनी को कुछ और ही मंज़ूर होता है। वीर सिंह तथा राजेश्वर सिंह के पोता-पोती (विवेक मुशरान और मनीषा कोइराला ) एक दूसरे के प्रेम में खो जाते हैं। वे साथ जीने मरने की कसमें खाते हैं, परन्तु जब उनका प्रेम सबके सामने आता है और उनके प्यार की सूचना दोनों कट्टर शत्रुओं को मिलती है तो उन पर प्रतिबंध लग जाते हैं। एक दूसरे की शक्ल भी न देखने की बंदिशें लगा दी जाती हैं। युवा प्रेमी अपने बुजुर्गों को पुनः मिलाने का निश्चय करते हैं। अंत में कई उतार-चढ़ावों से होती हुई फ़िल्म का सुखद अंत होता है।

  • सचिन भौमिक, सुभाष घई तथा कमलेश पाण्डेय की इस फ़िल्मी पटकथा में घटनाओं का ताना-बाना ख़ूबसूरती से बुना गया है। फ़िल्म में संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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