नया दौर  

नया दौर
Naya-Daur.jpg
निर्देशक बी. आर. चोपड़ा
निर्माता बी. आर. चोपड़ा
लेखक अख़्तर मिर्ज़ा, कामिल राशिद
कलाकार दिलीप कुमार, वैजयंती माला, अजीत, जॉनी वॉकर
संगीत ओ.पी. नैयर
गीतकार साहिर लुधियानवी
गायक मोहम्मद रफ़ी, शमशाद बेगम और आशा भोंसले
प्रसिद्ध गीत ये देश है वीर जवानों का
छायांकन एम. मल्होत्रा
संपादन प्राण मेहरा
प्रदर्शन तिथि 1957
अवधि 173 मिनट
भाषा हिन्दी
पुरस्कार फ़िल्मफ़ेयर:- सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशक, सर्वश्रेष्ठ कहानी
मुख्य संवाद ये लड़ाई तो मशीनों की है हमारी तुम्हारी काय की लड़ाई।
दुबारा प्रदर्शन 2007
दुबारा प्रदर्शन फ़िल्म का बजट तीन करोड़ रूपए

नया दौर दिलीप कुमार और वैजयंती माला के अभिनय से सजी भारतीय सिनेमा इतिहास की सुप्रसिद्ध फ़िल्म है, जिसे बी. आर. चोपड़ा ने बनाया था। आज भी इस फ़िल्म का संगीत बड़े चाव से सुना जाता है। इस फ़िल्म को रंगीन करने में तीन वर्ष से भी ज़्यादा का समय लगा। [1] नया दौर जो 1957 में बनी थी वो उस ज़माने की बहुत बड़ी सफल फ़िल्म थी। बी. आर. चोपड़ा की इस फ़िल्म ने जो संदेश उस समय दिया था वो आज के समय में भी उतना ही प्रसिद्ध है। उस समय की ये एक क्रांतिकारी फ़िल्म मानी गयी थी जैसा की इसके नाम से ही ज़ाहिर होता है नया दौर।[2] नया दौर चोपड़ा संभवतः उनकी सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म कही जा सकती है। मनुष्य बनाम मशीन जैसे ज्वलंत विषय को उन्होंने बहुत संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया है और उस पर ओ.पी. नैयर का पंजाबियत लिया सुरीला संगीत जैसे विषय को नये अर्थ दे रहा हो।[3]

कथावस्तु

औद्योगिक क्रांति के परिप्रेक्ष्य में वर्ष 1957 में बनी फ़िल्म ‘नया दौर’ में मशीन और मनुष्य के बीच की लड़ाई और फिर मनुष्य की जीत को दिखा गया है। चोपड़ा को सामाजिक मुद्दों पर प्रगतिशील फ़िल्में बनाने का श्रेय जाता है। फ़िल्म में दिलीप कुमार एक ऐसे तांगे वाले की भूमिका में हैं जो एक संपन्न व्यापारी को चुनौती देता है। यह व्यापारी तांगों की जगह सड़कों पर बसों की स्वीकार्यता बढ़ाने के प्रयास में ग़रीब तांगे वालों के हितों की अनदेखी करता है।[4]

यह फ़िल्म 1957 में जब श्वेत-श्याम में प्रदर्शित हुई थी तो इसके गीत संगीत और कहानी में बुने गए आज़ादी के बाद मानव और मशीन के संघर्ष के बीच दोस्ती, प्रेम, त्याग और आज़ादी के बाद आम आदमी के होने की गाथा एक नई सिनेमा की भाषा की प्रतीक थी। लेकिन आज भी इसके मायने नहीं बदले हैं। हालाकि इसकी कहानी हमारे समाज और देश की मुख्यधारा के उसी सिनेमा की है जिसमें शंकर (दिलीप कुमार) और कृष्णा (अजीत) नाम के दोस्तों की कहानी है जो एक दूसरे पर जान देते हैं लेकिन उनके बीच जब एक लड़की रजनी (वैजयंती माला) आ जाती है तो न केवल उनकी दोस्ती के मायने बदल जाते हैं बल्कि गांव के ज़मींदार (नासिर हुसैन) के शहर से पढकर लौटे बेटे (जीवन) के गांव में आरा मशीन और लॉरी लाने के बाद तो वे एक दूसरे के दुश्मन भी हो जाते हैं।[5]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. रंगीन ‘नया दौर’ (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) वेब दुनिया। अभिगमन तिथि: 31 अगस्त, 2010
  2. 2.0 2.1 2.2 2.3 नया दौर नया रंग (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) ममता टी वी। अभिगमन तिथि: 31 अगस्त, 2010
  3. बीआर चोपड़ा अपने समय से आगे के फ़िल्मकार थे (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) मोहल्ला लाईव। अभिगमन तिथि: 31 अगस्त, 2010
  4. नया दौर फ़िल्म कालजयी है: वैजयंतीमाला (हिन्दी) (एच.टी.एम.एल) जागरण। अभिगमन तिथि: 31 अगस्त, 2010
  5. 5.0 5.1 समीक्षा : नया दौर (रंगीन) (हिन्दी) हिन्दी मीडिया डॉट इन। अभिगमन तिथि: 31 अगस्त, 2010
  6. चले पवन की चाल (हिन्दी) दैनिक भास्कर। अभिगमन तिथि: 31 अगस्त, 2010
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