पिण्डारी  

पिण्डारी लङाका

पिण्डारी (पिंडारी / पंडारी / पेंढारी) दक्षिण भारत में जा बसे युद्धप्रिय पठान सवार थे। उनकी उत्पत्ति तथा नामकरण विवादास्पद है। वे बड़े कर्मठ, साहसी तथा वफ़ादार थे। टट्टू उनकी सवारी थी। तलवार और भाले उनके अस्त्र थे। वे दलों में विभक्त थे और प्रत्येक दल में साधारणत: दो से तीन हज़ार तक सवार होते थे। योग्यतम व्यक्ति दल का सरदार चुना जाता था। उसकी आज्ञा सर्वमान्य होती थी। पिण्डारियों में धार्मिक संकीर्णता न थी। 19वीं शताब्दी में हिन्दू (विशेषकर जाट) और सिख भी उनके सैनिक दलों में शामिल थे। उनकी स्त्रियों का रहन-सहन हिन्दू स्त्रियों जैसा था। उनमें देवी देवताओं की पूजा प्रचलित थी। ये कुछ क़बाइली संस्कृति का नेतृत्व करते थे

अनियमित सवार, जो मराठा सेनाओं के साथ-साथ चलते थे। उन्हें कोई वेतन नहीं दिया जाता था और शत्रु के देश को लूटने की इजाज़त रहती थी। यद्यपि कुछ प्रमुख पिण्डारी नेता पठान थे, तथापि सभी जातियों के खूंखार और ख़तरनाक व्यक्ति उनके दल में सम्मिलित थे। उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में उनको शिन्दे का संरक्षण प्राप्त था। उसने उनको नर्मदा घाटी के मालवा क्षेत्र में ज़मीन दे रखी थीं। वहाँ से वे मध्य भारत में दूर-दूर तक धावे मारते थे और अमीरों तथा ग़रीबों को समान रूप से लूटा करते थे। 1812 ई॰ में उन्होंने बुंदेलखंड, 1815 ई॰ निज़ाम के राज्य में तथा 1816 ई॰ में उत्तरी सरकार में लूटपाट की। इस तरह उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की शांति और समृद्धि के लिए ख़तरा उत्पन्न कर दिया। अतएव 1817 ई॰ गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने उनके विरुद्ध अभियान के लिए एक बड़ी सेना संगठित की। यद्यपि पिण्डारी विरोधी अभियान के फलस्वरूप तीसरा मराठा युद्ध छिड़ गया तथापि पिण्डारियों का दमन कर दिया गया। उनके पठान नेता अमीर खांको टोंक के नवाब के रूप में मान्यता प्रदान कर दी गयी। उसने अंग्रेज़ों की अधीनता स्वीकार कर ली। पिण्डारियों का दूसरा महत्त्वपूर्ण नेता चीतू था। उसका पीछा किया जाने पर वह जंगलों में भाग गया, जहाँ एक चीते ने उसे खा डाला।[1]

मराठों की सेना में महत्त्वपूर्ण स्थान

मराठों की अस्थायी सेना में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान था। पिंडारी सरदार नसरू ने मुग़लों के विरुद्ध शिवाजी की सहायता की। पुनापा ने उनके उत्तराधिकारियों का साथ दिया। गाज़ीउद्दीन ने बाजीराव प्रथम को उसके उत्तरी अभियानों में सहयोग दिया। चिंगोदी तथा हूल के नेतृत्व में 15 हज़ार पिंडारियों ने पानीपत के युद्ध में भाग लिया। अंत में वे मालवा में बस गए और सिंधिया शाही तथा होल्कर शाही पिंडारी कहलाए। बाद में चीतू, करीम ख़ाँ, दोस्तमुहम्मद और वसीलमुहम्मद सिंधिया की पिंडारी सेना के प्रसिद्ध सरदार हुए तथा कादिर खाँ, तुक्कू खाँ, साहिब खाँ और शेख दुल्ला होल्कर की सेना में रहे।
पिंडारी सवारों की कुल संख्या लगभग 50,000 थी। युद्ध में लूटमार और विध्वंस के कार्य उन्हीं को सौंपे जाते थे। लूट का कुछ भाग उन्हें भी मिलता था। शांतिकाल में वे खेतीबाड़ी तथा व्यापार करते थे। गुज़ारे के लिए उन्हें करमुक्त भूमि तथा टट्टू के लिए भत्ता मिलता था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. भारतीय इतिहास कोश- लेखक सच्चिदानन्द भट्टाचार्य पृष्ठ संख्या 241
  2. McEldowney, Philip F.। Pindari Society and the Establishment of British Paramountcy in India (English) (एच.टी.एम.एल) virginia.edu। अभिगमन तिथि: 12 अक्टूबर, 2010।
  3. "दुर्राह" पिण्डारी नेता के आधीन एक समूह को कहते थे जिसका रूप क़बीले जैसा होता था।
  4. 4.0 4.1 सलमान की ‘वीर’ से पिंडारी समाज खुश हुआ (हिन्दी) (php) josh18.in.com। अभिगमन तिथि: 12 अक्टूबर, 2010।

संबंधित लेख

और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=पिण्डारी&oldid=541247" से लिया गया