लोकसभा उपाध्यक्ष  

लोकसभा उपाध्यक्ष (अंग्रेज़ी: Deputy Speaker of the Lok Sabha) का पद भारत की संसदीय प्रणाली में काफ़ी महत्त्वपूर्ण है। लोकसभा अध्यक्ष के बाद उपाध्यक्ष ही लोकसभा का कार्य निर्वाहन करता है। लोकसभा के उपाध्यक्ष को विपक्ष से चुने जाने की परंपरा है। लोकसभा के सदस्य अपने में से किसी एक का उपाध्यक्ष के रूप में चुनाव करते हैं। यदि संबंधित सदस्य की लोकसभा सदस्यता खत्म हो जाती है तो उसका अध्यक्ष या उपाध्यक्ष पद भी खत्म हो जाता है। उपाध्यक्ष अपना त्यागपत्र अध्यक्ष को संबोधित करता है। लोकसभा के उपस्थित सदस्यों के बहुमत से सम्मत किये हुए प्रस्ताव के अनुसार अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पदच्युत किया जा सकता है। वर्तमान में लोकसभा के उपाध्यक्ष का पद रिक्त है, क्योंकि निवर्तमान उपाध्यक्ष एम. थंबीदुरई का कार्यकाल 16वीं लोकसभा के भंग होने से 25 मई, 2019 को पूर्ण हो गया।[1]

शुरुआत

वैसे परंपरा के मुताबिक लोकसभा उपाध्यक्ष का पद विपक्षी दल को दिया जाता है, लेकिन यह परंपरा बीच-बीच में भंग होती रही है। इस परंपरा की शुरुआत छठी लोकसभा से हुई थी। पहली लोकसभा से लेकर पांचवीं लोकसभा तक सत्तारूढ़ कांग्रेस से ही उपाध्यक्ष चुना जाता रहा। आपातकाल के बाद 1977 में छठी लोकसभा के गठन के बाद जनता पार्टी ने सत्ता में आने पर मधुलिमए, प्रो. समर गुहा, समर मुखर्जी आदि सांसदविदों के सुझाव पर लोकसभा उपाध्यक्ष का पद विपक्षी पार्टी को देने की परंपरा शुरू की। उस लोकसभा में कांग्रेस के गौडे मुराहरि उपाध्यक्ष चुने गए थे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 सात महीने बाद भी 17वीं लोकसभा को उपाध्यक्ष नहीं मिल सका (हिंदी) bbc.com। अभिगमन तिथि: 03 अप्रॅल, 2020।

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