रघु केवट  

रघु केवट
Blankimage.jpg
पूरा नाम रघु केवट
कर्म भूमि भारत
कर्म-क्षेत्र पीपलीचटी ग्राम, जगन्नाथ पुरी से दस कोस की दूरी पर।
प्रसिद्धि भक्त
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी रघु केवट श्री जगन्नाथ जी का परम भक्त था। पूर्व जन्‍म के पुण्‍य संस्‍कारों के प्रभाव से रघु के हृदय में भगवान की भक्ति थी, सबेरे स्‍नान करके भगवन्नाम का जप करता था। भागवत सुनना और सत्‍संग में जाना उसका दैनिक कार्य था। एक बार भक्त की प्रेमभरी प्रार्थना सुनकर कृपा सागर प्रभु ने रघु केवट को अपने दिव्‍य चतुर्भुज रूप में दर्शन दिए।

रघु केवट पीपलीचटी ग्राम में मछलियाँ पकड़ने का कार्य किया करता था। पकड़ी हुई मछलियों को बेचकर वह परिवार का पालन-पोषण किया करता था। घर में स्‍त्री और बूढ़ी माता थी। पूर्व जन्‍म के पुण्‍य संस्‍कारों के प्रभाव से रघु के हृदय में भगवान की भक्ति थी। वह अत्‍यन्‍त दयालु था। मछलियाँ जब उसके जाल में आकर तड़पने लगतीं, तब उसका चित्त व्‍याकुल हो जाता। उसे अपने कार्य पर ग्‍लानि होती; परंतु जीवन-निर्वाह का दूसरा कोई साधन न होने से वह अपने व्‍यवसाय को छोड़ नहीं पाता था। [1]

परिचय

श्री जगन्नाथ पुरी से दस कोस दूर पीपलीचटी ग्राम में रघु केवट का घर था। घर में स्‍त्री और बूढ़ी माता थी। सबेरे जाल लेकर रघु मछलियाँ पकड़ने जाता और पकड़ी हुई मछलियों को बेचकर परिवार का पालन करता। पूर्व जन्‍म के पुण्‍य संस्‍कारों के प्रभाव से रघु के हृदय में भगवान की भक्ति थी। वह अत्‍यन्‍त दयालु था। मछलियाँ जब उसके जाल में आकर तड़पने लगतीं, तब उसका चित्त व्‍याकुल हो जाता। उसे अपने कार्य पर ग्‍लानि होती; परंतु जीवन-निर्वाह का दूसरा कोई साधन न होने से वह अपने व्‍यवसाय को छोड़ नहीं पाता था।

रघु ने एक अच्‍छे गुरु से दीक्षा ले ली थी। गले में तुलसी की कण्‍ठी बाँध ली थी। सबेरे स्‍नान करके भगवन्नाम का जप करता था। भागवत सुनना और सत्‍संग में जाना उसका दैनिक कार्य हो गया था। इन सब से उसका अन्‍त: करण धीरे-धीरे शुद्ध हो गया। जीवमात्र में भगवान विराजमान हैं, यह बात उसकी समझ में आने लगी। जीव-हिंसा से उसे अब तीव्र विरक्ति हो गयी। रघु के लिये मछली पकड़ना बहुत ही क्‍लेशदायक हो गया। उसने इस काम को छोड़ दिया। कुछ दिन तो घर के संचित अन्न से काम चला; पर संचय था ही कितना। उपवास होने लगा। घर में त्राहि-त्राहि मच गयी। पेट की ज्‍वाला तथा माता और स्‍त्री के तिरस्‍कार से व्‍याकुल होकर रघु को फिर जाल उठाना पड़ा। वह स्‍वयं तो भूख से प्राण दे सकता था, पर वद्धा माता और पत्‍नी का कष्‍ट उससे सहा नहीं जाता था। पछताता, भगवान से प्रार्थना करता।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 पुस्तक- भक्त चरितांक | प्रकाशक- गीता प्रेस, गोरखपुर | विक्रमी संवत- 2071 (वर्ष-2014) | पृष्ठ संख्या- 677

संबंधित लेख

और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=रघु_केवट&oldid=599883" से लिया गया