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*दीक्षा प्राप्ति के पश्चात् 2 दिन बाद इन्होनें खीर से प्रथम पारणा किया था।
*इसके पश्चात् 6 महीने तक कठोर तप करने के बाद पद्मप्रभ को [[कौशाम्बी]] में ही [[चैत्र मास|चैत्र माह]] की [[पूर्णिमा]] तिथि को 'प्रियंगु' वृक्ष के नीचे 'कैवल्य ज्ञान' की प्राप्ति हुई।
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*इसके पश्चात् 6 महीने तक कठोर तप करने के बाद पद्मप्रभ को [[कौशाम्बी]] में ही [[चैत्र मास|चैत्र माह]] की [[पूर्णिमा]] तिथि को 'प्रियंगु' वृक्ष के नीचे '[[कैवल्य ज्ञान]]' की प्राप्ति हुई।
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*जैन धर्मावलम्बियों के मतानुसार [[फाल्गुन]] [[कृष्ण पक्ष]] की चतुर्दशी तिथि को [[सम्मेद शिखर]] पर इन्होंने [[निर्वाण]] को प्राप्त किया।<ref>{{cite web |url=http://dharm.raftaar.in/Religion/Jainism/Tirthankar/Padmprabh|title=श्री पद्मप्रभ जी|accessmonthday=26 फ़रवरी|accessyear=2012|last= |first=|authorlink= |format= |publisher= |language=[[हिन्दी]]}}</ref>
  
 
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13:41, 21 मार्च 2014 के समय का अवतरण

पद्मप्रभ जैन धर्म के छठे तीर्थंकर थे। पद्मप्रभ का जन्म कौशाम्बी के इक्ष्वाकु वंश में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष द्वादशी को चित्रा नक्षत्र में हुआ था। इनकी [[माता] का नाम सुसीमा देवी और पिता का नाम धरणराज था। इनके शरीर का वर्ण लाल जबकि चिह्न कमल था।

  • पद्मप्रभु के यक्ष का नाम मातंग और यक्षिणी का नाम अप्रति चक्रेश्वरी था।
  • जैनियों के मतानुसार भगवान पद्मप्रभ के गणधरों की संख्या 108 थी, जिनमें पद्योतन स्वामी इनके प्रथम गणधर थे।
  • पद्मप्रभ को कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को कौशाम्बी में दीक्षा की प्राप्ति हुई।
  • दीक्षा प्राप्ति के पश्चात् 2 दिन बाद इन्होनें खीर से प्रथम पारणा किया था।
  • इसके पश्चात् 6 महीने तक कठोर तप करने के बाद पद्मप्रभ को कौशाम्बी में ही चैत्र माह की पूर्णिमा तिथि को 'प्रियंगु' वृक्ष के नीचे 'कैवल्य ज्ञान' की प्राप्ति हुई।
  • जैन धर्मावलम्बियों के मतानुसार फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सम्मेद शिखर पर इन्होंने निर्वाण को प्राप्त किया।[1]


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टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. श्री पद्मप्रभ जी (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 26 फ़रवरी, 2012।

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