"श्री श्यामसुन्दर का मन्दिर वृन्दावन": अवतरणों में अंतर
भारत डिस्कवरी प्रस्तुति
आदित्य चौधरी (वार्ता | योगदान) छो (Text replace - '[[category' to '[[Category') |
व्यवस्थापन (वार्ता | योगदान) छो (Text replacement - "पश्चात " to "पश्चात् ") |
||
(3 सदस्यों द्वारा किए गए बीच के 6 अवतरण नहीं दर्शाए गए) | |||
पंक्ति 1: | पंक्ति 1: | ||
*[[राधादामोदर जी मन्दिर वृन्दावन|श्रीराधादामोदर मन्दिर]] के पास ही श्रीश्यामसुन्दर जी का मन्दिर स्थित है। | |||
*[[राधादामोदर जी मन्दिर|श्रीराधादामोदर मन्दिर]] के पास ही श्रीश्यामसुन्दर जी का मन्दिर स्थित है। | |||
*गौड़ीय वेदान्ताचार्य श्रील बलदेव विद्याभूषण द्वारा प्रतिष्ठित एवं सेवित श्रीराधा श्यामसुन्दर विग्रह के दर्शन अत्यन्त सुन्दर हैं। | *गौड़ीय वेदान्ताचार्य श्रील बलदेव विद्याभूषण द्वारा प्रतिष्ठित एवं सेवित श्रीराधा श्यामसुन्दर विग्रह के दर्शन अत्यन्त सुन्दर हैं। | ||
*मन्दिर के प्रवेश द्वार के सामने श्रीश्यामानन्द प्रभु की समाधि का दर्शन है। | *मन्दिर के प्रवेश द्वार के सामने श्रीश्यामानन्द प्रभु की समाधि का दर्शन है। | ||
*श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभु उड़ीसा के अन्तर्गत प्रसिद्ध रेमुना के निकटवर्ती किसी गाँव में जन्मे थे। | *श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभु उड़ीसा के अन्तर्गत प्रसिद्ध रेमुना के निकटवर्ती किसी गाँव में जन्मे थे। | ||
*चिलका हृद के तट पर किसी विद्वत गाँव में इन्होंने व्याकरण, अलंकार और न्याय शास्त्र का अध्ययन किया। | *चिलका हृद के तट पर किसी विद्वत गाँव में इन्होंने व्याकरण, अलंकार और न्याय शास्त्र का अध्ययन किया। | ||
* | *तत्पश्चात् [[वेद]] अध्ययन के लिए मैसूर गये। | ||
*उसी समय उड़ुपी में उन्होंने वेदान्त के मध्व-भाष्य के साथ-साथ शंकर-भाष्य, श्री-भाष्य, पारिजात-भाष्य एवं अन्यान्य वेदान्त के भाष्यों का गहन अध्ययन किया। | *उसी समय उड़ुपी में उन्होंने वेदान्त के मध्व-भाष्य के साथ-साथ शंकर-भाष्य, श्री-भाष्य, पारिजात-भाष्य एवं अन्यान्य वेदान्त के भाष्यों का गहन अध्ययन किया। | ||
*कुछ दिन | *कुछ दिन पश्चात् श्रीधाम जगन्नाथ पुरी में श्रीरसिकानन्द प्रभु के शिष्य श्रीराधादामोदर के समीप षट्सन्दर्भ का अध्ययन किया। | ||
*अध्ययन करते समय श्रीराधादामोदर का अगाध पाण्डित्य तथा साथ ही भक्तिमय जीवन का दर्शनकर उनके शिष्य हो गये। | *अध्ययन करते समय श्रीराधादामोदर का अगाध पाण्डित्य तथा साथ ही भक्तिमय जीवन का दर्शनकर उनके शिष्य हो गये। | ||
* | *तत्पश्चात् [[वृन्दावन]] में प्रसिद्ध गौड़ीय रसिकाचार्य श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के निकट श्रीमद्भागवत एवं अन्यान्य गोस्वामी-ग्रन्थों का अध्ययन किया तथा श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के निर्देश से [[जयपुर]] में पधारे। | ||
*वहाँ ' | *वहाँ 'ग़लता' नामक प्रसिद्ध स्थान में श्री-सम्प्रदाय तथा अन्यान्य विपक्ष के विद्वानों को पराजित कर श्रीविजयगोपाल विग्रह की स्थापना की। | ||
*साथ ही उन्होंने अत्रस्थ विद्वानों की प्रतीति के लिए ब्रह्मसूत्र के श्रीगोविन्दभाष्य की रचना की तथा जयपुर के प्रसिद्ध गोविन्द-मन्दिर में श्रीगोविन्ददेव के साथ श्री[[राधा]]जी की भी पुन: प्रतिष्ठा की। | *साथ ही उन्होंने अत्रस्थ विद्वानों की प्रतीति के लिए ब्रह्मसूत्र के श्रीगोविन्दभाष्य की रचना की तथा जयपुर के प्रसिद्ध गोविन्द-मन्दिर में श्रीगोविन्ददेव के साथ श्री[[राधा]]जी की भी पुन: प्रतिष्ठा की। | ||
*उनके द्वारा रचित गोविन्दभाष्य, षट्सन्दर्भ की टीका, सिद्धान्तरत्नम्, वेदान्तस्यामन्तक, प्रमेयरत्नावली, सिद्धान्तदर्पण आदि ग्रन्थावली ने श्रीगौड़ीय-वैष्णव-साहित्य के भण्डार की श्रीवृद्धि की है। | *उनके द्वारा रचित गोविन्दभाष्य, षट्सन्दर्भ की टीका, सिद्धान्तरत्नम्, वेदान्तस्यामन्तक, प्रमेयरत्नावली, सिद्धान्तदर्पण आदि ग्रन्थावली ने श्रीगौड़ीय-वैष्णव-साहित्य के भण्डार की श्रीवृद्धि की है। | ||
{{प्रचार}} | |||
== | ==संबंधित लेख== | ||
{{ब्रज के दर्शनीय स्थल}} | {{ब्रज के दर्शनीय स्थल}} | ||
[[Category:ब्रज]] | [[Category:ब्रज]] |
07:34, 7 नवम्बर 2017 के समय का अवतरण
- श्रीराधादामोदर मन्दिर के पास ही श्रीश्यामसुन्दर जी का मन्दिर स्थित है।
- गौड़ीय वेदान्ताचार्य श्रील बलदेव विद्याभूषण द्वारा प्रतिष्ठित एवं सेवित श्रीराधा श्यामसुन्दर विग्रह के दर्शन अत्यन्त सुन्दर हैं।
- मन्दिर के प्रवेश द्वार के सामने श्रीश्यामानन्द प्रभु की समाधि का दर्शन है।
- श्रीबलदेव विद्याभूषण प्रभु उड़ीसा के अन्तर्गत प्रसिद्ध रेमुना के निकटवर्ती किसी गाँव में जन्मे थे।
- चिलका हृद के तट पर किसी विद्वत गाँव में इन्होंने व्याकरण, अलंकार और न्याय शास्त्र का अध्ययन किया।
- तत्पश्चात् वेद अध्ययन के लिए मैसूर गये।
- उसी समय उड़ुपी में उन्होंने वेदान्त के मध्व-भाष्य के साथ-साथ शंकर-भाष्य, श्री-भाष्य, पारिजात-भाष्य एवं अन्यान्य वेदान्त के भाष्यों का गहन अध्ययन किया।
- कुछ दिन पश्चात् श्रीधाम जगन्नाथ पुरी में श्रीरसिकानन्द प्रभु के शिष्य श्रीराधादामोदर के समीप षट्सन्दर्भ का अध्ययन किया।
- अध्ययन करते समय श्रीराधादामोदर का अगाध पाण्डित्य तथा साथ ही भक्तिमय जीवन का दर्शनकर उनके शिष्य हो गये।
- तत्पश्चात् वृन्दावन में प्रसिद्ध गौड़ीय रसिकाचार्य श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के निकट श्रीमद्भागवत एवं अन्यान्य गोस्वामी-ग्रन्थों का अध्ययन किया तथा श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर के निर्देश से जयपुर में पधारे।
- वहाँ 'ग़लता' नामक प्रसिद्ध स्थान में श्री-सम्प्रदाय तथा अन्यान्य विपक्ष के विद्वानों को पराजित कर श्रीविजयगोपाल विग्रह की स्थापना की।
- साथ ही उन्होंने अत्रस्थ विद्वानों की प्रतीति के लिए ब्रह्मसूत्र के श्रीगोविन्दभाष्य की रचना की तथा जयपुर के प्रसिद्ध गोविन्द-मन्दिर में श्रीगोविन्ददेव के साथ श्रीराधाजी की भी पुन: प्रतिष्ठा की।
- उनके द्वारा रचित गोविन्दभाष्य, षट्सन्दर्भ की टीका, सिद्धान्तरत्नम्, वेदान्तस्यामन्तक, प्रमेयरत्नावली, सिद्धान्तदर्पण आदि ग्रन्थावली ने श्रीगौड़ीय-वैष्णव-साहित्य के भण्डार की श्रीवृद्धि की है।