वी. के. मूर्ति  

वी. के. मूर्ति
वी. के. मूर्ति
पूरा नाम वेंकटरामा पंडित कृष्णमूर्ति
जन्म 26 नवम्बर, 1923
जन्म भूमि मैसूर, कर्नाटक
मृत्यु 7 अप्रॅल, 2014
मृत्यु स्थान बैंगलोर, कर्नाटक
कर्म भूमि मुंबई, महाराष्ट्र
कर्म-क्षेत्र कैमरामैन
मुख्य फ़िल्में 'जाल', 'प्यासा'. 'काग़ज़ के फूल', 'साहिब, बीबी और ग़ुलाम', 'डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया' और 'सीआईडी' आदि।
शिक्षा सिनेमेटोग्राफ़ी में डिप्लोमा
विद्यालय बैंगलोर इंस्टीट्यूट
पुरस्कार-उपाधि 'फ़िल्म फ़ेयर पुरस्कार' (1959), (1962); 'आईआईएफ़ए लाइफ़ टाइम एचीवमेंट अवार्ड' (2005); 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' (2008)
नागरिकता भारतीय
अन्य जानकारी एक स्वतंत्र कैमरामैन के रूप में वी. के. मूर्ति की पहली फ़िल्म 1952 में गुरुदत्त के साथ 'जाल' थी।

वेंकटरामा पंडित कृष्णमूर्ति (अंग्रेज़ी: Venkatarama Pandit Krishnamurthy; जन्म: 26 नवम्बर, 1923 - मृत्यु: 7 अप्रॅल, 2014) भारतीय सिने जगत में एक जाना-पहचाना नाम है। वे हिन्दी फ़िल्मों के प्रसिद्ध सिनेमेटोग्राफ़र हैं। एक कैमरामैन के रूप में वी. के. मूर्ति ने बहुत नाम कमाया है। उनके कैमरे का जादू मुस्कुराते होठों की उदासी, आँखों के काले घेरों की स्याह नमी, गुलाबी सर्दियों की गुनगुनाती गर्माहट और किताबों में छुपी चिठ्ठियों से उठती प्रेम की खुशबू आदि सब कुछ कैद कर सकता है। वी. के. मूर्ति कला और तकनीक के अद्भूत सम्मिश्रण तथा हिन्दी सिनेमा में प्रकाश और छाया के अतुलनीय प्रयोगों का नाम है। वे ऐक्टर-डायरेक्टर गुरुदत्त की टीम के साथ जुड़े थे। 'प्यासा', 'काग़ज़ के फूल', 'चौंदहवीं का चांद' और 'साहब बीबी और ग़ुलाम' जैसी गुरुदत्त की ब्लैक ऐंड वाइट फ़िल्मों में उन्होंने लाइट और कैमरे से चमत्कार उत्पन्न करके दर्शकों का मन मोह लिया था। उन्हें देश के सबसे बड़े सम्मान 'दादा साहब फाल्के पुरस्कार' (2008) के लिए भी चुना गया।

जन्म तथा शिक्षा

वी. के. मूर्ति का जन्म 26 नवम्बर, 1923 को मैसूर, कर्नाटक में हुआ था। अपने स्कूली जीवन में ही अभिनेता या फिर एक फ़िल्म तकनीशियन बनने के लिये वह मुंबई आ गए। यहाँ किसी भी तरह का कोई उत्साहवर्धन उन्हें नहीं मिला और वे वापस घर आ गये। बाद में वी. के. मूर्ति मैसूर के दीवान, विश्वेश्वरैया द्वारा स्थापित 'बैंगलोर इंस्टीट्यूट' से जुड़ गये। यहाँ इन्होंने सिनेमाटोग्राफी की शिक्षा ली और डिप्लोमा लिया।

व्यवसाय

इंस्टीट्यूट छोडऩे के बाद भी वायलिन वादक की उनकी ट्रेनिंग ने मूर्ति को फ़िल्मों में काम दिलाने में मदद की। एक कैमरामैन के रूप में उन्हें पहला मौका सिनेमाटोग्राफर द्रोणाचार्य के सहायक की तरह काम करते हुये मिला। पश्चिमी फ़िल्मों में प्रकाश और छाया के कलात्मक प्रयोगों से प्रेरणा लेते हुये वी. के. मूर्ति ने भारतीय फ़िल्मों में भी कई प्रयोग किये। वी. के. मूर्ति फाली मिस्त्री की कला से भी ख़ासे प्रभावित हुए। प्रकाश के स्त्रोतों का निश्चित फ़्रेमों ओर जीवंत प्रारूपों में प्रयोग और इन पर ख़ास फ़ोकस भारतीय सिनेमा को मिस्त्री की अनमोल देन है। इन्होंने 'आरजू' और 'उडऩ खटोला' जैसी फ़िल्मों में मिस्त्री के सहायक की तरह काम किया और प्रकाश-बिंबों के साथ नये प्रयोग करने सीखे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. फाल्के अवॉर्ड विजेता सिनेमेटॉग्राफर वी. के. मूर्ति का निधन (हिंदी) नवभारत टाइम्स। अभिगमन तिथि: 10 अप्रॅल, 2014।

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