दुर्ग  

Disamb2.jpg दुर्ग एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- दुर्ग (बहुविकल्पी)

दुर्ग शब्द का तात्पर्य है ऐसा गढ़ जहाँ पहुँचना कठिन हो। युद्ध के तरीकों में परिवर्तन के साथ दुर्ग का अर्थ भी बदलता रहा है, क्योंकि युद्ध से दुर्ग का सीधा संबंध है। किसी भूभाग या क्षेत्र की नैसर्गिक रक्षात्मक शक्ति की वृद्धि करना भी अब दुर्ग निर्माण के अंतर्गत माना जाता है।

दुर्ग (क़िला या राजधानी)

मनु[1]ने राजधानी को राष्ट्र के पूर्व रखा है। मेघातिथि[2] एवं कुल्लुक का कथन है कि राजधानी पर शत्रु के अधिकार से भय उत्पन्न हो जाता है, क्योंकि वहीं सारा भोज्य पदार्थ एकत्र रहता है, वहीं प्रमुख तत्त्व एवं सैन्यबल का आयोजन रहता है। अत: यदि राजधानी की रक्षा की जा सकी तो परहस्त-गत राज्य लौटा लिया जा सकता है और देश की रक्षा की जा सकती है। भले ही राज्य का कुछ भाग शत्रु जीत ले, किन्तु राजधानी अविजित रहनी चाहिए। राजधानी ही शासन-यंत्र की धुरी है। कुछ लेखकों ने [3]पुर (राजधानी) या दुर्ग को राष्ट्र के उपरान्त स्थान दिया है। प्राचीन युद्ध परम्परा तथा उत्तर भारत की भौगोलिक स्थिति के कारण ही राज्य के तत्त्वों में राजधानी एवं दुर्गों को इतनी महत्ता दी गई है। राजधानी देश की सम्पत्ति का दर्पण थी और यदि वह ऊंची-ऊंची दीवारों से सुदृढ़ रहती थी तो सुरक्षा का कार्य भी करती थी।

याज्ञवल्क्य[4] ने लिखा है कि दुर्ग की स्थिति से राजा की सुरक्षा, प्रजा एवं कोश की रक्षा होती है[5]। मनु [6] ने दुर्ग के निर्माण का कारण भली-भांति बता दिया है, दुर्ग में अवस्थित एक धनुर्धर सौ धनुर्धरों को तथा सौ धनुर्धर एक सहस्र धनुर्धरों को मार गिरा सकते हैं।[7]। राजनीति प्रकाश द्वारा उद्धृत बृहस्पति में आया है कि अपनी-अपनी रानियों, प्रजा एवं एकत्र की हुई सम्पत्ति की रक्षा के लिए राजा को प्राकारों (दीवारों) एवं द्वार से युक्त दुर्ग का निर्माण करना चाहिए।[8]

चार प्रकार के दुर्गों का उल्लेख

कौटिल्य[9] ने दुर्गों के निर्माण एवं उनमें से किसी एक में राजधानी बनाने के विषय में सविस्तार लिखा है। उन्होंने चार प्रकार के दुर्गों का उल्लेख किया है, यथा-

  1. औदक (जल से सुरक्षित, जो द्वीप-सा हो, जिसके चारों ओर जल हो)
  2. पार्वत (पहाड़ी पर या गुफ़ा वाला)
  3. धान्वन (मरुभूमि वाला, जलविहीन भूमिखंड, जहाँ झाड़-झंकार हों या अनुर्वर भूमि हो)
  4. वन-दुर्ग (जहाँ खंजन, जल-मुर्गियां हों, जल हो, झाड़-झंकार और बेंत एवं बाँसों के झुण्ड हों)।

कौटिल्य का कहना है कि प्रथम दो प्रकार के दुर्ग जल-संकुल स्थानों को सुरक्षा के लिए हैं और अन्तिम दो प्रकार जंगलों की रक्षा के लिए हैं। वायुपुराण [10] ने दुर्ग के चार प्रकार दिए हैं।

मनु के अनुसार छ: प्रकार के दुर्ग

मनु [11], शान्तिपर्व[12], विष्णुधर्मसूत्र [13], मत्स्यपुराण [14], अग्निपुराण [15], विष्णुधर्मोत्तर [16], शुक्रनीतिसार [17]ने छ: प्रकार बताये हैं, यथा-

  1. धान्व दुर्ग (जल विहीन, खुली भूमि पर पाँच योजन के घेरे में)
  2. महीदुर्ग (स्थल दुर्ग, प्रस्तर खंडों या ईंटों से निर्मित प्राकारों वाला, जो 12 फुट से अधिक चौड़ा और चौड़ाई से दुगुना लम्बा हो)
  3. जलदुर्ग (चारों ओर जल से आवृत)
  4. वार्क्ष-दुर्ग (जो चारों ओर से एक योजन तक कँटीले एवं लम्बे-लम्बे वृक्षों, कँटीले लता-गुल्मों एवं झाड़ियों से आवृत्त हो)
  5. नृदुर्ग (जो चतुरंगिनी सेना से चारों ओर से सुरक्षित हो)
  6. गिरिदुर्ग (पहाड़ों वाला दुर्ग, जिस पर कठिनाई से चढ़ा जा सके और जिसमें केवल एक ही संकीर्ण मार्ग हो)।

मनु [18] ने गिरिदुर्ग को सर्वश्रेष्ठ कहा है, किन्तु शान्तिपर्व [19] ने नृदुर्ग को सर्वोत्तम कहा है, क्योंकि उसे जीतना बड़ा ही कठिन है। मानसोल्लास [20] ने प्रस्तरों, ईंटों एवं मिट्टी से बने अन्य तीन प्रकार जोड़कर नौ दुर्गों का उल्लेख किया है। मनु [21], सभापर्व [22], अयोध्या [23], मत्स्यपुराण [24], कामन्दकीय नीतिसार [25], मानसोल्लास [26], शुक्रनीतिसार [27], विष्णुधर्मोत्तर [28] के अनुसार दुर्ग में पर्यापत आयुध, अन्न, औषध, धन, घोड़े, हाथी, भारवाही पशु, ब्राह्मण, शिल्पकार, मशीनें (जो सैकड़ों को एक बार मारती हैं), जल एवं भूसा आदि सामान होने चाहिए। नीतिवाक्यामृत[29] का कहना है कि दुर्ग में गुप्त सुरंग होनी चाहिए, जिससे गुप्त रूप से निकला जा सके, नहीं तो वह बन्दी गृह सा हो जायेगा, वे ही लोग आने-जाने पायें, जिनके पास संकेत चिह्न हों और जिनकी हुलिया भली-भांति ले ली गयी हो। विशेष जानकारी के लिए देखिए कौटिल्य [30], राजधर्मकांड [31], राजधर्मकौस्तुभ [32], जहाँ उशना, महाभारत, मत्स्यपुराण, विष्णुधर्मोत्तर आदि से कतिपय उद्धरण दिये गए हैं।[33]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. मनु (9|294)
  2. मेघातिथि (मनु 9|295)
  3. (यहाँ तक की मनु ने भी, 7|69-70)
  4. याज्ञवल्क्य (1|321)
  5. (जनकोशात्मकगुप्तये)
  6. मनु (7|74)
  7. देखिए पंचतन्त्र (1|229 एवं 2|14)
  8. बृहस्पति। आत्मदारार्थलोकानां सञ्चितानां तु गुप्तये। नृपति: कारयेद दुर्ग प्राकारद्वारसंयुतम्। राजनीतिप्रकाश, पृष्ठ 202 एवं राजधर्म काण्ड, पृष्ठ 28।
  9. कौटिल्य (2|3 एवं 4)
  10. वायु पुराण (8|108)
  11. मनु (7|70)
  12. शान्तिपर्व (56|35 एवं 86|4-5)
  13. विष्णुधर्मसूत्र (3|6)
  14. मत्स्यपुराण (217|6-7)
  15. अग्निपुराण (222|4-5)
  16. विष्णुधर्मोत्तर (2|26|6-9, 3|323|16-21)
  17. शुक्रनीतिसार (4|6)
  18. मनु (7|79)
  19. शान्तिपर्व (56|35)
  20. मानसोल्लास (2|5, पृष्ठ 78)
  21. मनु (7|75)
  22. सभापर्व (5|36)
  23. अयोध्या (100|53)
  24. मत्स्यपुराण (217|8)
  25. कामन्दकीय नीतिसार(4|60)
  26. मानसोल्लास (3|5, श्लोक 550-555)
  27. शुक्रनीतिसार (4|612-13)
  28. विष्णुधर्मोत्तर (2|26|20-88)
  29. (दुर्गसमुद्देश, पृष्ठ 199)
  30. कौटिल्य (2|3)
  31. राजधर्मकांड (पृष्ठ 28-36)
  32. राजधर्मकौस्तुभ (पृष्ठ 115-117)
  33. 33.0 33.1 33.2 33.3 पुस्तक- धर्मशास्त्र का इतिहास | पृष्ठ संख्या- 663 - 666 | लेखक- पांडुरंग वामन काणे
  34. (ऋग्वेद 1|63|7)
  35. (ऋग्वेद 2|20|8)
  36. देखिए हॉप्किंस, जे.ए.ओ.एस., जिल्द 13, पृष्ठ 174-176।
  37. तैत्तिरीयसंहिता (6|2|3|1)
  38. (मार्शल, जिल्द 1, पृष्ठ 15-26)
  39. (वनपर्व, 1|9-10)
  40. (विराटपर्व 22|16 एवं 25-26)। और देखिए शान्तिपर्व (69|60, 86|4-15)।
  41. रामायण (5|2|50-53)
  42. बृहतसंहिता (अध्याय 53)
  43. मनु (7|70 एवं 76)
  44. आश्रमवासिक (5|16-17)
  45. शान्तिपर्व (86|6-10)
  46. कामन्दकीय नीतिसार (4|57)
  47. मत्स्यपुराण (217|9)
  48. शुक्रनीतिसार (1|213-217)
  49. कौटिल्य (2|4)
  50. (मत्स्यपुराण 217|9-87)
  51. राजनीतिप्रकाश (पृष्ठ 208-213)
  52. राजधर्मकांड (पृष्ठ 28-36)
  53. राजनीतिप्रकाश (पृष्ठ 214-219)
  54. eमिलाइये 'ग्रामा हट्टादिशून्या:, पुरोहट्टादिमत्य:, त एव महत्य: पत्तनानि, दुर्गाण्यौदकादीनि। खेटा: कर्षकग्रामा:। खर्वटा: पर्वतप्रान्तग्रामा इति।' श्रीधर (भागवतपुराण 4|18|31), राजनीतिकौस्तुभ द्वारा उद्धृत (पृष्ठ 102)। शिल्परत्न (अध्याय 5) में ग्राम, खेटक, खर्वट, दुर्ग, राजधानी, पत्तन, द्रोणिक, शिबिर, स्कन्धावार, स्थानीय, विडम्बक, निगम एवं शाखानगर की परिभाषाएं दी गयी हैं। मय मत (10|92) ने इनमें दस का उल्लेख किया है और (9|10) ग्राम, खेट, खर्वट, दुर्ग तथा नगर के विस्तार का वर्णन किया है।
  55. (प्राचांग्रामनगराणाम्)
  56. वायुपुराण (94|40)
  57. शुक्रनीतिसार (1|213-258)
  58. युक्तिकल्पतरु (पृष्ठ 22)
  59. वायुपुराण (8|108)
  60. मत्स्यपुराण (130)
  61. शुक्रनीतिसार (1|260-267)
  62. रामायण (6|112|42, सिक्तरथ्यान्तरायणा)
  63. महाभारत (आदिपर्व 221|36)
  64. हर्षचरित (3)
  65. कौटिल्य (2|36)
  66. (एपि. इ., जिल्द 20, पृष्ठ 59)
  67. (एपि. ई., जिल्द, 15, पृष्ठ 130, 133, गुप्त संवत 129)
  68. (मैकरिंडिल की एंश्येण्ट इंडिया, फ़्रैगमेंट 34, पृष्ठ 187)
  69. (मैकरिंडिल, पृष्ठ 209-210)
  70. (जिल्द 1, पृष्ठ 380)।
  71. (पाणिनि 2|1|16)
  72. (वार्तिक 4, पाणिनि 4|3|36 एवं जिल्द 2, पृष्ठ 321, पाणिनि 4|3|134)
  73. और देखिए राइस डेविड्स (बुद्धिस्ट इंडिया, पृष्ठ 34-41)।
  74. भागवत पुराण (4|18|30-32)
  75. राजनीतिकौस्तुभ (पृष्ठ 130-4)

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