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तार (डाक)  

Disamb2.jpg तार एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- तार (बहुविकल्पी)
तार (डाक)
तार
विवरण तार अथवा टेलीग्राम डाक द्वारा भेजा जाने वाला एक संदेश (पत्र) होता है।
शुरुआत 11 फरवरी, 1855 को आम जनता के लिए यह सुविधा शुरू हुई।
टेलीग्राफ़ एक्ट अक्टूबर 1854 में पहली बार टेलीग्राफ़ एक्ट बनाया गया।
तार सेवा समाप्त टेलीग्राम सेवा से लगातार गिरते राजस्व के बाद सरकार ने बीएसएनएल बोर्ड को फैसला लेने का अधिकार दिया और उसने डाक विभाग से सलाह-मशविरे के बाद टेलीग्राम सेवा को 15 जुलाई, 2013 से बंद करने का फैसला किया।
विशेष 1957-58 में एक साल में तीन करोड़ दस लाख तार भेजे गए, और इनमें से 80 हज़ार तार हिंदी में थे।
अन्य जानकारी 1981-82 तक देश में 31 हज़ार 457 तारघर थे और देशी तारों की बुकिंग 7 करोड़ 14 लाख तक पहुंच चुकी थी।

तार अथवा टेलीग्राम डाक द्वारा भेजा जाने वाला एक संदेश (पत्र) होता है। फ़ोन से पहले दशकों तक दूर तक संदेश भेजने के दो ही जरिए थे- चिट्ठी और तार। 15 जुलाई को 2013 को तार का सिस्टम खत्म हो गया। 5 नवंबर 1850 को जिस माध्यम का भारत में पहली बार प्रयोग हुआ और 1855 से जो आम जन का माध्यम बन गया, उसका अंत अस्वाभाविक तो नहीं है, लेकिन ये खबर करोड़ों लोगों को अतीत की स्मृतियों में ज़रूर ले गई है। जैसे मानव जीवन में कुछ भी स्थायी नहीं है, वैसा ही मानव सभ्यता में भी कोई चीज हमेशा के लिए नहीं है। तकनीक के विकास के साथ अतीत की तकनीक का इतिहास बन जाना स्वाभाविक परिघटना है। डाक विभाग के अस्तित्व में आने से संदेशवाहकों और कबूतरों के जरिए पैगाम भेजने की प्रथा खत्म हो गई। टेलीफोन ने टेलीग्राम की अहमियत में सेंध लगानी शुरू की। मोबाइल के युग ने पुराने टेलीफोन को भी अप्रासंगिक कर दिया। एसएमएस, ई-मेल, सोशल नेटवर्किंग पर चैटिंग ने दुनिया को इतना समेट दिया कि कई दिन तो छोड़िए संपर्क जुड़ने और जवाब आने में कुछ मिनट भी लग जाएं तो सब्र टूटने लगता है। तो कम से कम चौबीस घंटे में पहुंचने वाले टेलीग्राम का युग जाना ही था। उसने स्वाभाविक मत्यु का वरण किया है। लेकिन उसकी श्रद्धांजलि में यह ज़रूर कहा जाना चाहिए उसने अपने युग में संपर्क और संवाद के तीव्रतम माध्यम के रूप में आधुनिक राष्ट्रों के निर्माण में विशिष्ट भूमिका निभाई। इस तरह मानव सभ्यता के इतिहास में वह अपनी ख़ास जगह बना कर गया है। स्मृतियों से उसे बेदख़ल करना असंभव है।[1]

इतिहास

भारतीय डाक-तार सेवा के इतिहास पर शोध करने वाले अरविंद कुमार सिंह बताते हैं, ‘1857 के विद्रोह के वक़्त अंग्रेज़ों के टेलीग्राफ़ विभाग की असल परीक्षा हुई, जब विद्रोहियों ने अंग्रेज़ों को जगह-जगह मात देनी शुरू कर दी थी. अंग्रेज़ों के लिए तार ऐसा सहारा था जिसके ज़रिए वो सेना की मौजूदगी, विद्रोह की ख़बरें, रसद की सूचनाएं और अपनी व्यूहरचना सैकड़ों मील दूर बैठे अपने कमांडरों के साथ साझा कर सकते थे।’
तार बुकिंग केंद्र

कुछ इतिहासकार मानते हैं कि तार की वजह से बग़ावत दबाने में अंग्रेज़ों को काफ़ी मदद मिली। एक तरफ़ विद्रोहियों के पास ख़बरें भेजने के लिए हरकारे थे, दूसरी तरफ़ अंग्रेजों के पास बंदूक़ों के अलावा सबसे बड़ा हथियार था- तार, जो मिनटों में सैकड़ों मील की दूरी तय करता था। इस वजह से अंग्रेज़ों का टेलीग्राफ़ विभाग बाग़ियों की हिट लिस्ट में आ गया। नतीजा यह हुआ कि दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, इंदौर जैसी जगहों पर बाग़ियों ने तार लाइनें ध्वस्त कर दीं और वहां काम कर रहे अंग्रेज़ कर्मचारियों को मार डाला। मेरठ समेत कई जगहों पर बाग़ियों ने तार के खंभों को जलावन की तरह इस्तेमाल किया। कुछ जगह तार गोलियां बनाने के काम आए। लोहारों ने खंभों का इस्तेमाल तोप बनाने तक में किया। 918 मील लंबी तार की लाइनें तोड़ दी गईं। अरविंद कुमार सिंह बताते हैं, ‘बिहार के सासाराम और आरा, इलाहाबाद और अलीगढ़ में इन्हें उखाड़कर तोप की तरह इस्तेमाल किया गया। दिल्ली में विद्रोही तार विभाग के काम से इतने नाराज़ थे कि जब उन्हें कुछ समझ न आया तो उन्होंने राइफल के कुंदों से तार मशीनें ही तोड़ डालीं।' बाद में सन 1902 में इन कर्मियों की याद में दिल्ली में टेलीग्राफ़ मैमोरियल खड़ा किया गया। जिस पर उन कर्मचारियों के नाम दर्ज किए गए जिन्होंने विद्रोह की ख़बरें तार से भेजते हुए जान गंवाई थीं। 1857-58 में तार की वजह से मिली कामयाबी के बाद अंग्रेज़ों ने पूरे हिंदुस्तान को तार के लिए ज़रिए जोड़ने का फ़ैसला किया। सैकड़ों मील की नई लाइनें बिछाई गईं। 1885-86 में डाक और तार विभाग के दफ़्तर एक कर दिए गए। इसके बाद 1 जनवरी 1882 से अंतरदेशीय प्रेस टेलीग्राम शुरू हुए जिनका फ़ायदा अख़बारों ने उठाया। आज़ादी के बाद 1 जनवरी 1949 को नौ तारघरों– आगरा, इलाहाबाद, जबलपुर, कानपुर, पटना और वाराणसी आदि में हिंदी में तार सेवा की शुरुआत हुई। आज़ादी मिलने के बाद भारत ने पहली पंचवर्षीय योजना में ही सिक्किम के खांबजांग इलाके में दुनिया की सबसे ऊंची तार लाइन पहुंचा दी।[2]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. टेलीग्राम का जाना (हिंदी) नया इंडिया। अभिगमन तिथि: 27 दिसम्बर, 2013।
  2. 2.0 2.1 टेलीग्राम: 1857 का विद्रोह 'दबाने' वाले की मौत (हिंदी) बीबीसी हिंदी। अभिगमन तिथि: 27 दिसम्बर, 2013।
  3. टेलीग्राम का तार आज के बाद हमेशा के लिए बंद (हिंदी) ज़ी न्यूज। अभिगमन तिथि: 27 दिसम्बर, 2013।
  4. 4.0 4.1 इतिहास बन जायेगा अब टेलीग्राम (हिंदी) देशबंधु। अभिगमन तिथि: 27 दिसम्बर, 2013।
  5. 160 सालों का लम्बा सफ़र तय करने के बाद बंद होगी टेलीग्राम सेवा (हिंदी) पर्दा फाश।
  6. इतिहास में दर्ज आखिरी टेलीग्राम राहुल गांधी के नाम (हिंदी) P7 न्यूज।

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