मेघदूत  

मेघदूत
'मेघदूत' का आवरण पृष्ठ
कवि महाकवि कालिदास
मूल शीर्षक मेघदूत
प्रकाशक डायमंड पॉकेट बुक्स
प्रकाशन तिथि 1 जनवरी 2005
ISBN 81-7182-947-3
देश भारत
भाषा संस्कृत (मूल)
विधा काव्य-ग्रंथ
विशेष मेघदूत विप्रलम्भ श्रृंगार का संस्कृत साहित्य में साहित्य में सर्वोत्कृष्ट काव्य कहा जा सकता है।
टिप्पणी समीक्षकों ने इसे न केवल संस्कृत जगत् में अपितु विश्व साहित्य में श्रेष्ठ काव्य के रूप में अंकित किया है।

मेघदूत महाकवि कालिदास की अप्रतिम रचना है। अकेली यह रचना ही उन्हें 'कविकुल गुरु' उपाधि से मण्डित करने में समर्थ है। भाषा, भावप्रवणता, रस, छन्द और चरित्र-चित्रण समस्त द्दष्टियों से मेघदूत अनुपम खण्डकाव्य है। सहृदय रसिकों ने मुक्त कण्ठ से इसकी सराहना की है। समीक्षकों ने इसे न केवल संस्कृत जगत् में अपितु विश्व साहित्य में श्रेष्ठ काव्य के रूप में अंकित किया है। मेघदूत में कथानक का अभाव सा है। वस्तुत: यह प्रणयकार हृदय की अभिव्यक्ति है।

  • मेघदूत के दो भाग हैं -
  1. पूर्वमेघ एवं
  2. उत्तरमेघ।

विषयवस्तु

अलका नगरी के अधिपति धनराज कुबेर अपने सेवक यक्ष को कर्तव्य-प्रमाद के कारण एक वर्ष के लिए नगर - निष्कासन का शाप दे देते हैं। वह यक्ष अलका नगरी से सुदूर दक्षिण दिशा में रामगिरि के आश्रमों में निवास करने लगता है। सद्यविवाहित यक्ष जैसे - तैसे आठ माह व्यतीत कर लेता है, किंतु जब वह आषाढ़ मास के पहले दिन रामगिरि पर एक मेघखण्ड को देखता है, तो पत्नी यक्षी की स्मृति से व्याकुल हो उठता है। वह यह सोचकर कि मेघ अलकापुरी पहुँचेगा तो प्रेयसी यक्षी की क्या दशा होगी, अधीर हो जाता है और प्रिया के जीवन की रक्षा के लिए सन्देश भेजने का निर्णय करता है। मेघ को ही सर्वोत्तम पात्र के रूप में पाकर यथोचित सत्कार के अनंतर उससे दूतकार्य के लिए निवेदन करता है। रामगिरि से विदा लेने का अनुरोध करने के पश्चात् यक्ष मेघ को रामगिरि से अलका तक का मार्ग सविस्तार बताता है। मार्ग में कौन-कौन से पर्वत पड़ेंगे जिन पर कुछ क्षण के लिए मेघ को विश्राम करना है, कौन-कौन सी नदियाँ जिनमें मेघ को थोड़ा जल ग्रहण करना है और कौन-कौन से ग्राम अथवा नगर पड़ेंगे, जहाँ बरसा कर उसे शीतलता प्रदान करना है या नगरों का अवलोकन करना है, इन सबका उल्लेख करता है। उज्जयिनी, विदिशा, दशपुर आदि नगरों, ब्रह्मावर्त, कनखल आदि तीर्थों तथा वेत्रवती, गम्भीरा आदि नदियों को पार कर मेघ हिमालय और उस पर बसी अलका नगरी तक पहुँचने की कल्पना यक्ष करता है। उत्तरमेघ में अलकानगरी, यक्ष का घर, उसकी प्रिया और प्रिया के लिए उसका सन्देश- यह विषयवस्तु है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 14वीं-15वीं शताब्दी
  2. 14वीं शताब्दी
  3. 15वीं शताब्दी
  4. 1618 वि.सं.
  5. 1693 वि. सं.
  6. 17वीं शताब्दी
  7. 1709 वि. सं.
  8. 1700 वि.सं.
  9. 1777 वि.सं.
  10. मेघदूत: सं. नन्दरगीकर,पृ. 101 पर उद्धत।
  11. मेघदूत: कृष्णपतिकृत टीका, सं. गोपिकामोहन भट्टाचार्य, पृ.
  12. मेघदूत: सं. नन्दगीकर, पृ.101 तथा जतीन्द्रविमल चौधरी का सं., पृ. 25
  13. मेघदूत: सुबोध टीका, सं. जतीन्द्रविमल चौधरी, कलकत्ता, 1950, पृ.2
  14. मेघदूत: सुबोध टीका, सं. जतीन्द्रविमल चौधरी, कलकत्ता, 1950, पृ.1
  15. कवेर्यक्षवृत्तांते सीताराघववृत्तांतसमाधिरस्तीति केचित। तन्न सहृदयहृदयसंवादाय। कविनैव 'जनकतनयास्नान' इति, 'रघुपतिपदै:, इति चात्यंततटस्थतया प्रतिपादितत्वात उपरि च 'इत्याख्याते पवनतनयं मैथिलीवोन्मुखी सा इत्यत्रोपमानतया प्रतिपादयिष्यमाणत्वात। (विद्युल्लता, पृ.7)
  16. मेघसन्देश, विद्युल्लता टीका, सं. कृष्णमाचारियर, पृ.5-6
  17. 'जातां मन्ये शिशिरमथितां पद्मिनीं वान्यरूपाम।'
  18. मेघसन्देश, विद्युल्लता टीका, सं. कृष्णमाचारियर, पृ.125-26
  19. 'जाने सख्यास्तव मयि मन: सम्भृतस्नेहम'
  20. विवरण के लिये द्र.- संस्कृत के सन्देश काव्य: रामकुमार आचार्य, पृ. 85-86
  21. दीघनिकाय 21।2
  22. कालिदास: हिज आर्ट एण्ड थाट, टी.जी. मईणकरण, 1962, पृ.121-24
  23. कालिदास: हिज आर्ट एण्ड थाट, टी.जी. मईणकरण, 1962, पृ.126-27
  24. मेघसन्देश: एन एसेसमेण्ट फ्रॉम द साउथ, एन. पी. उन्नि, दिल्ली, 1987 ई. में पृ.12 पर उद्धत।
  25. मेघदूत, पूर्वमेध पद्य 14
  26. मेघसन्देश: सं. एन. पी. उन्नि पृ.36 पर प्रदीप टीका।
  27. सुवृत्ततिलक, 3।21, काव्यमाला गुच्छक-2,पृ.52

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