किरातार्जुनीयम्  

किरातार्जुनीयम् प्रसिद्ध प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में से एक है। इसे एक उत्कृष्ट काव्य रचना माना जाता है। इसके रचनाकार महाकवि भारवि हैं, जिनका समय छठी-सातवीं शताब्दी माना जाता है। यह रचना 'किरात' रूपधारी शिव एवं पांडु पुत्र अर्जुन के बीच हुए धनुर्युद्ध तथा वार्तालाप पर आधारित है। 'महाभारत' में वर्णित किरातवेशी शिव के साथ अर्जुन के युद्ध की लघु कथा को आधार बनाकर कवि ने राजनीति, धर्मनीति, कूटनीति, समाजनीति, युद्धनीति, जनजीवन आदि का मनोरम वर्णन किया है। यह काव्य विभिन्न रसों से ओतप्रोत है।

कथावस्तु

भारवि की कीर्ति का आधार-स्तम्भ उनकी एकमात्र रचना ‘किरातार्जुनीयम्’ महाकाव्य है, जिसकी कथावस्तु महाभारत से ली गई है। इसमें अर्जुन तथा 'किरात' वेशधारी शिव के बीच युद्ध का वर्णन है। अन्ततोगत्वा शिव प्रसन्न होकर अर्जुन को 'पाशुपतास्त्र' प्रदान करते हैं।

वीर रस प्रधान

किरातार्जुनीयम् एक वीर रस प्रधान 18 सर्गों का महाकाव्य है। इनका प्रारम्भ 'श्री' शब्द से होता है तथा प्रत्येक सर्ग के अन्तिम श्लोक में ‘लक्ष्मी’ शब्द का प्रयोग मिलता है। यह कृति अपने अर्थगौरव के लिए प्रसिद्ध है।[1] कवि ने बड़े से बड़े अर्थ को थोड़े से शब्दों में प्रकट कर अपनी काव्य कुशलता का परिचय दिया है। कोमल भावों का प्रदर्शन भी कुशलतापूर्वक किया गया है। प्राकृतिक दृश्यों तथा ऋतुओं का वर्णन भी रमणीय है।

काव्य चातुर्य और भाषा

भारवि ने केवल एक अक्षर ‘न’ वाला श्लोक लिखकर अपनी काव्य चातुरी का परिचय दिया है। कहीं-कहीं कविता में कठिनता भी आ गई है। इस कारण विद्वानों ने इनकी कविता को ‘नारिकेल फल के समान’ बताया है। किरात में राजनीतिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन भी अत्यन्त उत्कृष्टता के साथ में किया गया है। इसकी भाषा उदात्त एवं हृदय भावों को प्रकट करने वाली है। कवि में कोमल तथा उग्र दोनों प्रकार के भावों को प्रकट करने की समान शक्ति एवं सामर्थ्य थी। प्रकृति के दृश्यों का वर्णन भी अत्यन्त मनोहारी है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. भारवेरर्थगौरवम्
  2. महाकवि भारवि द्वारा रचित किरातार्जुनीयम्, द्वितीय सर्ग
  3. महाकवि भारवि द्वारा रचित किरातार्जुनीयम्, द्वितीय सर्ग

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