पार्श्वगायन  

पार्श्वगायन
पार्श्वगायन करते मोहम्मद रफ़ी
विवरण वे अभिनेता या अभिनेत्री जो गायन विद्या में निपुण नहीं होते, उनके बदले में नेपथ्य से कोई दूसरा अच्छा गायक या गायिका गाती है, यही गायन 'पार्श्वगायन' कहलाता है।
सम्बंधित क्षेत्र भारतीय सिनेमा, संगीत, नाट्य आदि।
प्रारम्भकर्ता प्रसिद्ध संगीतकार आर. सी. बोराल, पंकज मलिक और नितिन बोस को भारतीय सिनेमा में पार्श्वगायन की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है।
प्रसिद्ध पार्श्वगायक मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार, लता मंगेशकर, आशा भोंसले, मुकेश, महेंद्र कपूर, हेमंत कुमार, शमशाद बेगम आदि।
संबंधित लेख आर. सी. बोराल, पंकज मलिक और नितिन बोस, पार्श्वगायक
अन्य जानकारी जब सिनेमा को आवाज मिली तो अभिनेता होने की शर्त में गायक होना शामिल था। के. एल. सहगल उस पीढ़ी के प्रतिमान माने जा सकते हैं। बाद के दिनों में पार्श्वगायन ने सिनेमा संगीत को एक विशिष्ट और स्वतंत्र पहचान देने की शुरुआत की

पार्श्वगायन अर्थात् वह गायन जो पर्दे के पीछे से किसी अभिनेता या अभिनेत्री के गाने के बदले होता है। जो अभिनेता या अभिनेत्री गान विद्या में निपुण नहीं होते, उसके बदले में नेपथ्य से कोई दूसरा अच्छा गायक या गायिका गाती है, यही गाना 'पार्श्वगायन' कहलाता है।

शुरुआत

अपने समय के ख्याति प्राप्त संगीतकार आर. सी. बोराल, पंकज मलिक और नितिन बोस को भारतीय सिनेमा में पार्श्वगायन की शुरुआत करने का श्रेय दिया जाता है। हिन्दी फ़िल्मों में पार्श्वगायन की शुरुआत से सम्बन्धित एक रोचक घटना है-

"जिस रास्ते से नितिन बोस प्रतिदिन अपने घर से 'न्यू थियेटर्स' जाते थे, उसी रास्ते में संगीतकार पंकज मलिक का घर पड़ता था। इसीलिए नितिन बोस प्रतिदिन पंकज मलिक को उनके घर के पास से उन्हें अपनी कार में बैठाकर स्टूडियो ले जाते और छोड़ जाते। यह सिलसिला चलता रहता था। रोज़ की ही भाँति नितिन बोस पंकज मलिक के दरवाज़े पर अपनी कार का हॉर्न बजा कर उन्हें बुला रहे थे, परन्तु पंकज मलिक पर इसका कोई असर नहीं हो रहा था। नितिन बोस को लगा कि शायद घर में कोई नहीं है। तभी लगातार कार के हॉर्न की आवाज सुन कर पंकज मलिक के पिता ने उनको कमरे में जा कर बताया की गेट पर नितिन बोस बहुत देर से तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं। इतना सुनते ही पंकज मलिक दौड़ते हुए नितिन बोस के पास पहुँचे और कहा- "माफ़ी चाहूँगा, मैं ज़रा अपने पसंदीदा अंग्रेज़ी गानों का रिकॉर्ड सुनते हुये उसके साथ गाने में मशगूल हो गया था। इसीलिए आपके कार के हॉर्न को नहीं सुन सका।

नितिन बोस ने इस घटना की चर्चा 'न्यू थियेटर्स' में आर. सी. बोराल से की और उनसे चर्चा करते हुये उन्हें अपना एक सुझाव दिया- "कि क्यूँ ना हम कुछ नया प्रयोग करें। जैसे पंकज उस गाने के साथ गाये जा रहे थे, उसी तरह गाने को भी पहले रिकॉर्ड किया जा सकता है। इससे हमें अभिनेताओं और अभिनेत्रियों की आवाज़ों के साथ समझौता नहीं करना पड़ेगा। हमारे पास विकल्प यह होगा की हम किसी सुरीले प्रशिक्षित गायक, गायिकायों की आवाज़ में गाने रिकॉर्ड कर सकते हैं और बाद में शूटिंग के समय फ़िल्म में अभिनय कर रहे चरित्र पर चित्रांकन कर सिनेमा को और रोचक बना सकते हैं। आर. सी. बोराल इस विचार से पूरी तरह सहमत हुये। फलस्वरूप उस समय नितिन बोस के ही निर्देशन में बन रही फ़िल्म 'धूप छावँ' (1935) के लिये उन्होंने पहला गाना "मैं खुश होना चाहूँ, खुश हो न सकूँ" रिकॉर्ड किया, जिसमें मुख्य स्वर के. सी. डे का था तथा कोरस में पारुल घोष, सुप्रवा सरकार एवं हरिमति के स्वर थे। इसके रिकोर्डिस्ट मुकुल बोस थे, जो नितिन बोस के ही भाई थे। मुकुल बोस भी 'न्यू थियेटर्स' में बतौर ध्वनि मुद्रक कार्यरत थे। इस प्रकार संगीतकार के तौर पर हिन्दी सिनेमा में पार्श्वगायन की परम्परा का श्रीगणेश करने का श्रेय आर. सी. बोराल को जाता है, जबकि प्रथम पार्श्वगायक होने का श्रेय के. सी. डे दिया गया।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 तकनीक लाई प्लेबैक सिगिंग में जनतंत्र (हिन्दी)। । अभिगमन तिथि: 09 नवम्बर, 2013।

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