पश्चात्ताप और प्रायश्चित्त  

'पश्चात्ताप' और 'प्रायश्चित्त' दोनों का अर्थ समान समझ लिया जाता है, पर ऐसा है नहीं। 'पश्चात्ताप' है भावना प्रधान और 'प्रायश्चित्त' है कर्म प्रधान। कोई काम कर गुजरने या कभी-कभी कोई उचित काम न करने के परिणामस्वरूप मन में ग्लानि पैदा हो, पछतावा हो, तो वह है 'पश्चात्ताप'। यह मन में पैदा होने वाला एक प्रकार का दु:ख का भाव है। जबकि 'प्रायश्चित्त' की स्थिति 'पश्चाताप' से आगे की है। किसी पापकर्म के बाद संवेदनशील व्यक्ति हो तो वह पहले पश्चाताप ही करता है और यह भाव ज्यादा संघनित हो जाए तो वह पापकर्म के निस्तार हेतु क्रियात्मक रूप से प्रायश्चित्त करना चाहता है। यह धार्मिक साधना और नैतिक दंड है। पश्चाताप से अधिक कठिन है प्रायश्चित्त। आपने किसी को दु:ख पहुँचाया, किसी का नुकसान कर दिया तो चाहें तो पश्चाताप करके रह जाएँ, नहीं तो नैतिक दायित्व समझें तो और आगे बढ़कर प्रायश्चित्त के रूप में उसकी क्षतिपूर्ति करें, आर्थिक सहायता या जैसे भी बन पड़े, नुकसान की भरपाई करें।




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