अस्थि  

अस्थि श्वेत रंग का एक कठोर ऊतक है जिससे सारे कशेरुकी (रीढ़वाले) जंतुओं के शरीर का कंकाल (ढाँचा) बनता है। अस्थिशरीर के आकार का आधार है। अस्थियों द्वारा ही शरीर गति करता है तथा भीतर के मुख्य अंग सुरक्षित रहते हैं। इन्हीं के कारण हमारे दैनिक कार्य संपन्न होते हैं।

अस्थि एक परिवर्तनशील ऊतक है ओर शरीर के बहुत से रासयानिक तथा जैव परिवर्तनों से उसका संबंध है। रक्त में होनेवाले रासायनिक परिवर्तनों तथा शरीर के अन्य भागों में अंत:स्रावी और आहारजन्य कारणों से स्वयं अस्थि में रचनात्मक परिवर्तन होने लगते हैं, और अस्थि भी इन परिवर्तनों का कारण होता है। आयुपर्यंत अस्थि का पुनर्निर्माण होता रहता है तथा उसकी रचना बदलती रहती है।

शरीर की अधिकतर अस्थियाँ लंबी होती हैं। इनमें एक दो चौड़े या फूले हुए शिरों के बीच लंबा कांड (खोखला बेलन) होता है। शिरों को वर्धक प्रांत कहते हैं, क्योंकि यहीं से अस्थि की वृद्धि होती है। अस्थि पर एक अत्यंत सूक्ष्म कला चढ़ी रहती है, जिसको अस्थ्यावरण कहते हैं। कांड के भीतर एक लंबी नलिका होती है जिसके बाहर ठोस अस्थि में दो भाग होते हैं। नलिका की ओर सुषिर भाग रहता है जो सछिद्र होता है। उसके बाहर संहत भाग होता है जो घना और ठोस होता है। बीच की नलिका में अस्थिमज्जा भरी रहती है। यहीं रक्त बनता है। अस्थिमज्जा ही रक्त की फैक्टरी है। रक्तनलिकाओं द्वारा अस्थि का पोषण होता है और उनमें नाड़ियों के सूत्र भी आते हैं। बहुत सी अस्थियों के प्रांतीय भागों पर हायलीन नामक उपास्थि चढ़ी रहती है। ये भाग संधियों के भीतर रहते हैं और उपस्थि के कारण ऐंठने नहीं पाते। इन प्रांतों पर अस्थि ऊतक विशेषकर क्रियमाण होता है और यही नवीन अस्थिनिर्माण होता है। शरीर की लंबाई इसी प्रांत पर निर्भर रहती है। जब प्रांत और कांड आपस में संयुक्त हो जाते हैं तो अस्थि की लंबाई की वृद्धि रुक जाती है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. डा० महेंद्रकुमार गोयल
  2. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 311 |

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