उत्सर्जी तन्त्र  

(अंग्रेज़ी: Excretory System) इस लेख में मानव शरीर से संबंधित उल्लेख है। कशेरुकी जन्तुओं में उत्सर्जी तन्त्र एवं जनन तन्त्रों में विशेष रूप से नर में, परस्पर बहुत सम्बन्ध होता है। इसलिए इन दोनों तन्त्रों को सम्मिलित रूप से मूत्रोजनन तन्त्र कहते हैं। मनुष्य में इन दोनों तन्त्रों के प्रमुख अंगों में तो कोई सम्बन्ध नहीं होता है, किन्तु इनकी वाहिनियों में महत्त्वपूर्ण सम्बन्ध होता है। मनुष्य के प्रमुख उत्सर्जी अंग एक जोड़ी वृक्क या गुर्दे होते हैं। इनसे सम्बन्धित अन्य उत्सर्जी अंग मूत्रवाहिनियाँ, मूत्राशय तथा मूत्र मार्ग हैं। ये सभी उत्सर्जी अंग मिलकर उत्सर्जी तन्त्र का निर्माण करते हैं। इस प्रकार उत्सर्जनी तंत्र शरीर की उस आंतरिक व्यवस्था (सिस्टम ऑफ अरेंजमेंट) को कहेंगे, जिसके द्वारा शरीर की कोशिकाओं के उपापचय (मेटॉबोलिज्म) से उत्पन्न मल या वर्ज्य पदार्थ (वेस्टेज) शरीर से बाहर निकलते रहते हैं। यहाँ पर ध्यान देने की बात है कि शरीर के भीतर कुछ और भी तंत्र होते हैं, जो इसी से मिलते जुलते कार्य करते हैं। इनके नाम हैं :-

  1. स्रवण (secretion) तथा,
  2. मलोत्सर्जन (defecation)।

स्रवण

शरीर में कुछ ऐसी ग्रंथियाँ होती हैं, जिनसे कुछ रासायनिक तत्व स्रवित होते रहते हैं। उदाहरणार्थ, नलिकाविहीन ग्रंथियों (endocrine glands) से हार्मोनों का स्रवण या जीभ की लारग्रंथियों (salivary glands) से लार या थूक (सेलिवा) का स्रवण इसी कोटि के हैं। सच पूछिए तो स्रवित पदार्थ या स्राव कोशिकाओं या ग्रंथियों के मल नहीं होते। मल या वर्ज्य पदार्थ हम उसे कहते हैं, जिसकी शरीर में कोई उपयोगिता नहीं होती। वस्तुत: वर्ज्य पदार्थो का शरीर से बाहर निकलना अपरिहार्य है, अन्यथा उनके विषाक्त प्रभाव से शरीर में रोग, अथवा कुछ स्थितियों में, प्राणी की मृत्यु तक हो सकती है। इसके विपरीत, स्रवित पदार्थो की शरीर में आवश्यकता होती है और उनसे शरीर की कतिपय आवश्यकताओं की पूर्ति होती रहती है। जैसे, लार खाने को पचाता है और हार्मोन शरीर की आंतरिक क्रियाएँ तथा तज्जन्य शारीरिक स्वास्थ्य बनाए रहते हैं।

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  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 2 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 87-90 |
  2. सं.ग्रं.-बेस्ट, सी.एच. तथा टेलर एन.बी. : द लिविंग बॉडी; गेयर, एम. एफ. ऐनिमल बॉयलोजी।
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