लेखन सामग्री  

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तीर-कमान और अन्य वस्तुओं के साथ मानव-आकृतियाँ। शैलाश्रय चित्र, इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय परिसर, भोपाल

मानव जाति के इतिहास में लेखन-सामग्री ने बड़ी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की है। लेखन-सामग्री ने न केवल मानव संस्कृति व इतिहास को सुरक्षित रखने में योगदान दिया है, बल्कि लिपि, भाषा और मनुष्य की चिंतनधारा को भी काफ़ी गहराई से प्रभावित किया है। अतः प्राचीन लेखन-सामग्री को जानने का मतलब है, प्राचीन संस्कृति को ठीक से समझना।

आज लेखन के लिए प्रमुखतः काग़ज़ और क़लम का उपयोग होता है। टाइपरायटर का इस्तेमाल पिछले क़रीब डेढ़ सौ सालों से हो रहा है। मगर अब बड़ी तेज़ी से कम्प्यूटर मशीन लेखन, प्रकाशन और प्रसारण का प्रमुख साधन बनती जा रही है। विज्ञान और टेक्नालॉजी के इतिहास की दृष्टि से भी लेखन-सामग्री सम्बन्धी जानकारी का बड़ा महत्त्व है।

लेखन की प्राचीनता

आज के समय में भले ही काग़ज़ का खूब इस्तेमाल होता हो, मगर इसकी खोज भारत में नहीं हुई। ‘काग़ज़ ’ शब्द अरबी का है। भारत में काग़ज़ का प्रयोग पिछले क़रीब एक हज़ार साल से हो रहा है। उसके पहले हमारे देश में लेखन के लिए प्रमुखतः ताड़पत्र, भूर्जपत्र और ताम्रपत्र का प्रयोग होता रहा है। इनके अलावा, अगरुपत्र, कपड़ा, काँच, काष्ठ, चमड़ा, पाषाण, स्वर्ण व रजतपत्र, मिट्टी की ईंटों व मुहरों तथा शंख व हाथीदाँत जैसी वस्तुओं का भी लेखन के लिए उपयोग हुआ है। आज ये चीज़ें संग्रहालयों में पहुँच गई हैं, परन्तु इस प्राचीन लेखन-सामग्री ने दीर्घकाल तक भारतीय संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान की अमूल्य सेवा की है।

शैलचित्र

भीमबेटका, पंचमढ़ी, मिर्ज़ापुर, आदमगढ़, होशंगाबाद आदि अनेक स्थानों से दस-पन्द्रह हज़ार साल पुराने शैलचित्र मिले हैं। प्रागैतिहासिक मानव की जीवनचर्या को प्रदर्शित करने वाले ये शैलचित्र, जिन्हें हम आदिम चित्रलिपि के चिह्न भी मान सकते हैं, अधिकतर लाल, हरे और सफ़ेद रंगों से बने हैं। ये रंग स्थानीय वनस्पति और खनिजों से तैयार किए गए हैं।

उदाहरण

भीमबेटका की पहाड़ी पर आज भी एक ऐसा पेड़ पाया जाता है, जिसके डंठलों से गोंद जैसा सफ़ेद रस निकलता है। उसी डंठल का कूची की तरह उपयोग करके उसके रस से सफ़ेद चित्र बनाए गए हैं। उस रस का उपयोग किसी स्थानीय वनस्पति या खनिज के हरे अथवा लाल रंग को पक्का बनाने के लिए भी किया गया है। भीमबेटका तथा कुछ अन्य स्थानों के शैलचित्रों के साथ संक्षिप्त ब्राह्मी लेख भी मिले हैं। इसीलिए स्पष्ट है कि प्राचीन भारत में लेखन-सामग्री के तौर पर शिलाखण्डों और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल कई हज़ार साल तक होता रहा है।

सिंधु सभ्यता की उत्कीर्ण मुद्रा

सिन्धु सभ्यता की उत्कीर्ण मुद्रा

सिन्धु सभ्यता (2600-1800 ई.पू.) के संक्षिप्त लेख, जिनकी संख्या लगभग चार हज़ार है, सेलखड़ी की मुहरों, ताम्रपट्टियों, लघुप्रस्तरों, काँसे के औज़ारों, हाथीदाँत व हड्डियों के दंडों, मिट्टी के बर्तनों तथा उनके ठीकरों पर अंकित देखने को मिलते हैं। यह ज्ञात नहीं है कि अपने दैनिक व्यवहार में सिन्धुजन किस लेखन-सामग्री का इस्तेमाल करते थे। उनके समकालीन मेसोपोटामिया के निवासी एक छोटी कील से गीली मिट्टी के फलकों पर अक्षर उकेरते थे। वे कीलाक्षर लेख पढ़े जा चुके हैं, परन्तु सिन्धु लिपि अभी भी अज्ञेय बनी हुई है।

वैदिक काल

वैदिक काल में लेखन-कला ज्ञात थी या नहीं, यह एक विवादास्पद विषय रहा है। मैक्समूलर जैसे आरम्भिक प्राच्यविद्या पण्डितों का मत था कि वेदों और ब्राह्मण ग्रन्थों में लिपि तथा लेखन सामग्री का कोई उल्लेख नहीं है। परन्तु इधर के वर्षों में वैदिक काल में लेखन के अस्तित्व के बारे में कई प्रमाण मिल चुके हैं। यह सही है कि वेदों को श्रुति (श्रवणीय रचना) कहा जाता है, परन्तु शतपथ ब्राह्मण का वचन है कि वामदेव ऋषि ने ऋचा 'देखकर सम्पादन किया'। उसी तरह ऐतरेय ब्राह्मण का उल्लेख है कि ऋषि ने 'ऋचा देखकर पढ़ी'। ऋग्वेद में गाय के कान पर पहचान के लिए, अंक-संकेत दागने का उल्लेख है। इस तरह के कई उल्लेख वैदिक वाङ्मय में देखने को मिलते हैं। सारांश यह है कि उस समय श्रवणीय रचनाएँ लिखित रूप में भी उपलब्ध रही हैं।

बौद्ध जातक

बौद्ध जातकों में लेखन के कई उल्लेख मिलते हैं। पाणिनि (लगभग 500 ई. पू.) की अष्टाध्यायी में ‘ग्रन्थ’, ‘लिपिकर’ ‘यवनानी लिपि’ और गायों के कानों पर, पहचान के लिए, अंक दागने की प्रथा का उल्लेख है। महाभारत में ‘ग्रन्थ’ शब्द ताड़पत्र अथवा भुर्जपत्र की पोथी के अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है। पाणिनि ने अष्टाध्यायी के अन्य सूत्रों को देखने[1] का कई बार निर्देश दिया है। इसीलिए व्याकरण के नियमों की इस कृति का लिपिबद्ध होना सुनिश्चित है। पर उस समय की लेखन सामग्री के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अन्योभ्योऽपि दृश्यते
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