गीतावली -तुलसीदास  

(गीतावली से पुनर्निर्देशित)


गीतावली -तुलसीदास
'गीतावली' का आवरण पृष्ठ
कवि गोस्वामी तुलसीदास
मूल शीर्षक 'गीतावली'
मुख्य पात्र 'श्रीराम
प्रकाशक लोकभारती प्रकाशन
देश भारत
भाषा अवधी
शैली छन्द
विषय श्रीराम की जीवनकथा
भाग सात खण्डों में विभक्त।
मुखपृष्ठ रचना सजिल्द
टिप्पणी 'गीतावली' सात खण्डों में विभक्त है। काण्डों में कथा का विभाजन प्राय: उसी प्रकार हुआ है, जिस प्रकार 'रामचरितमानस' में हुआ है।

गीतावली तुलसीदास की एक प्रमुख रचना है। इसमें गीतों में भगवान श्रीराम की कथा कही गयी है अथवा यों कहना चाहिए कि राम-कथा सम्बन्धी जो गीत गोस्वामी तुलसीदास ने समय-समय पर रचे, वे इस ग्रन्थ में संग्रहित हुए हैं। सम्पूर्ण रचना सात खण्डों में विभक्त है। काण्डों में कथा का विभाजन प्राय: उसी प्रकार हुआ है, जिस प्रकार 'रामचरितमानस' में हुआ है। किन्तु न इसमें कथा की कोई प्रस्तावना या भूमिका है और न ही 'मानस' की भाँति इसमें उत्तरकाण्ड में अध्यात्मविवेचन। बीच-बीच में भी 'मानस' की भाँति आध्यात्मिक विषयों का उपदेश करने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। सम्पूर्ण पदावली राम-कथा तथा रामचरित से सम्बन्धित है। मुद्रित संग्रह में 328 पद हैं।

पूर्ववर्ती रूप

'गीतावली' का एक पूर्ववर्ती रूप भी प्राप्त हुआ है, जो इससे छोटा था। उसका नाम 'पदावली रामायण' था। इसकी केवल एक प्रति प्राप्त हुई है और वह भी अत्यन्त खण्डित है। इसमें सुन्दर और उत्तरकाण्डों के ही कुछ अंश बचे हैं और उत्तरकाण्ड का भी अन्तिम अंश न होने के कारण पुष्पिका नहीं रह गयी है। इसलिए प्रति की ठीक तिथि ज्ञात नहीं है। यह संग्रह वर्तमान से छोटा रहा होगा। यह इससे प्रकट है कि प्राप्त अंशो में वर्तमान संग्रह के अनेक पद बीच-बीच में नहीं है। यदि यह कहा जाय कि यह वर्तमान का कोई चयन होगा, तो यह ठीक नहीं है, क्योंकि कभी-कभी छन्दों का क्रम भिन्न मिलता है। इसके अतिरिक्त इसके साथ की ही एक प्रति 'विनयपत्रिका' की प्राप्त हुई है, जिसका प्रति में ही 'राम गीतावली' नाम दिया हुआ है। वह भी 'विनयपत्रिका' का वर्तमान से छोटा पाठ देती है। इसलिए यह प्रकट है कि 'पदावली रामायण' का वह पाठ, जो प्रस्तुत एक मात्र प्रति में मिलता है, 'गीतावली' का ही कोई पूर्व रूप रहा होगा।

आलोचक कथन

'गीतावली' में कुछ पद[1] ऐसे भी हैं, जो 'सूरसागर' में मिलते हैं। प्राय: यह कहा जाता है कि ये पद उसमें 'सूरसागर' से गये होंगे। सूरदास, तुलसीदास से कुछ ज्येष्ठ थे, इसलिए कुछ आलोचक तो यह भी कहने में नहीं हिचकते कि इन्हें तुलसीदास ने ही 'गीतावली' में रख लिया होगा और जो इस सीमा तक नहीं जाना चाहते, वे कहते हैं कि तुलसीदास के भक्तों ने उनकी रचना को और पूर्ण बनाने के लिए यह किया होगा। किन्तु एक बात इस सम्बन्ध में विचारणीय है। 'गीतावली' की प्रतियाँ कई दर्जन संख्या में प्राप्त हुई है और वे सभी आकार-प्रकार में सर्वथा एक सी हैं और उन सबों में ये छन्द पाये जाते हैं।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. गीतावली, बालकाण्ड,23,24,28
  2. गीतावली(अयो.52
  3. गीतावली, अयो. पद 44
  4. गीतावली, उत्तर.2
  5. गीतावली (उत्तर.18-19 तथा 21-22

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