चैतन्य चरितावली  

चैतन्य चरितावली
'श्री श्री चैतन्य चरितावली' का आवरण पृष्ठ
लेखक संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी
मूल शीर्षक श्री श्री चैतन्य चरितावली
मुख्य पात्र चैतन्य महाप्रभु
प्रकाशक गीता प्रेस, गोरखपुर
देश भारत
विषय इस पुस्तक में चैतन्य देव के सम्पूर्ण जीवन-चरित्र की सुन्दर परिक्रमा है।
पुस्तक कोड 123
अन्य जानकारी इस पुस्तक में कीर्तन के रंग में रँगे महाप्रभु की लीलाएँ, अधर्मों के उद्धार की घटनाएँ, श्री चैतन्य में विभिन्न भगवद्भावों का आवेश, यवनों को भी पावन करने की कथा, श्रीवास, पुण्डरीक आदि की घटनाएँ वर्णित हैं।

श्री श्री चैतन्य चरितावली प्रसिद्ध संत प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी द्वारा रचित है। इसका प्रकाशन गीता प्रेस द्वारा किया गया था। यह बहुत पुराना संस्करण (1930-1935) है। यह पाँच भागों में है। सभी एक साथ हैं, परन्तु इसका प्रथम भाग थोड़ा अस्पष्ट है। आगे के सभी भाग अच्छे और पढ़ने योग्य है।

प्रस्तावना

इस पुस्तक की प्रस्तावना में प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी कहते हैं कि, "चैतन्‍यदेव के महान् जीवन में चैतन्‍यता का बीजारोपण तो गयाधाम में हुआ, नवद्वीप में आकर वह अंकुरित और कुछ-कुछ परिवर्धित हुआ। श्री नीलाचल (जगन्नाथ पुरी) में वह पल्‍लवित, पुष्पित और अमृतमय फलों वाला बन गया। उसके अमृतमय सुस्‍वादु फलों से असंख्‍य प्राणी सदा के लिये तृप्‍त हो गये और उनकी बुभुक्षा का अत्‍यन्‍ताभाव ही हो गया। उसकी नित्‍यानन्‍द और अद्वैत रूपी दो बड़ी-बड़ी शाखाओं ने सम्‍पूर्ण देश को सुखमय और शान्तिमय बना दिया। इसलिये हमारी प्रार्थना है कि पाठक इस मधुमय, आनन्‍दमय और प्रेममय दिव्‍य चरित्र को श्रद्धाभक्ति के साथ पढ़ें। इसके पठन से शान्ति सन्देहों का भंजन होगा, भक्‍तों के चरणों में प्रीति होगी और भगवान के समीप तक पहुँचने की अधिकारिभेद से जिज्ञासा उत्‍पन्‍न होगी। इससे पाठक यह न समझ बैठे़ कि इसमें कुछ मेरी कारीगरी या लेखन-चातुरी है, यह तो चैतन्‍य-चरित्र की विशेषता है। मुझ जैसे क्षुद्र जीव की चातुरी हो ही क्‍या सकती है? यदि इस ग्रन्थ के लेखन में कहीं मनोहरता, सुन्‍दरता या सरसता आदि आ गयी हो तो इन सबका श्रेय श्री कृष्‍णदास गोस्‍वामी, श्री वृन्दावनदास ठाकुर, श्री लोचनदास ठाकुर, श्री मुरारी गुप्‍त तथा श्री शिशिर कुमार घोष आदि पूर्ववर्ती चरित्र-लेखक महानुभावों को ही है और जहाँ-जहाँ कहीं विषमता, तीक्ष्‍णता, विरसता आदि दूषण आ गये हों, उन सबका दोष इस क्षुद्र लेखक को है और इसका एकमात्र कारण इस अज्ञानी की अल्‍पज्ञता ही है।[1]

लेखन

प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी ने मार्गशीर्ष की पूर्णिमा को 'श्री चैतन्‍य-चरितावली' का लिखना प्रारम्‍भ किया और वैशाखी पूर्णिमा को इसकी परिसमाप्ति हो गयी। संत प्रभुदत्त जी कहते हैं कि "इन पाँच महीनों में निरन्‍तर चैतन्‍य-चरित्रों का चिन्‍तन होता रहा। उठते-बैठते, सोते-जागते, नहाते-धोते, खाते-पीते, भजन-ध्यान, पाठ-पूजा और जप करते समय चैतन्‍य ही साथ बने रहे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 श्री श्री चैतन्य चरितावली |प्रकाशक: गीता प्रेस, गोरखपुर |संकलन: भारतकोश पुस्तकालय |संपादन: प्रभुदत्त ब्रह्मचारी |पृष्ठ संख्या: 8, 9, 15, 16 |
  2. श्री-श्री चैतन्य-चरितावली (हिन्दी) गीताप्रेस, गोरखपुर। अभिगमन तिथि: 22 मई, 2015।

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