लाला राम  

लाला राम

लांस नायक लाला राम (अंग्रेज़ी: Lance Naik Lala Ram, जन्म- 20 अप्रॅल, 1876, हिमाचल प्रदेश; मृत्यु- 23 मार्च, 1927) भारतीय थल सेना के 41वें डोगरा में लांस नाईक थे। उन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने मेसोपोटामिया (मौजूदा इराक) में हन्ना के युद्ध में 21 जनवरी, 1916 को बहादुरी की मिसाल कायम की, जिसके लिए उनको "विक्टोरिया क्रॉस" से सम्मानित किया गया।

  • लांस नायक लाला राम ने एक ब्रिटिश ऑफिसर को दुश्मन के करीब जमीन पर बेसुध पाया। वह ऑफिसर दूसरी रेजिमेंट का था।
  • लाला राम उस ऑफिसर को एक अस्थायी शरण में ले आए, जिसे उन्होंने खुद बनाया था। उसमें वह पहले भी चार लोगों की मरहम-पट्टी कर चुके थे।
  • जब उस अधिकारी के जख्म की मरहम-पट्टी कर दी तो उनको अपनी रेजिमेंट के एजुटेंट की आवाज सुनाई दी। एजुटेंट बुरी तरह जख्मी थे और जमीन पर पड़े थे।
  • लाला राम ने एजुटेंट को अकेले नहीं छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने अपने पीठ पर लादकर एजुटेंट को ले जाना चाहा, लेकिन एजुटेंट ने मना कर दिया।
  • उसके बाद वह शेल्टर में आ गए और अपने कपड़े उतारकर जख्मी अधिकारी को गर्म रखने की कोशिश की और अंधेरा होने तक उसके साथ रहे।
  • जब वह अधिकारी अपने शेल्टर में चला गया तो उन्होंने पहले वाले जख्मी अधिकारी को मुख्य खंदक में पहुंचाया। इसके बाद वह एक स्ट्रेचर लेकर गए और अपने एजुटेंट को वापस लाए।
  • उन्होंने अपने अधिकारियों के लिए साहस और समर्पण की अनोखी मिसाल कायम की।
  • लाला राम का 23 मार्च, 1927 में निधन हो गया और उनके अंतिम शब्द थे- "हमने सच्चे दिल से लड़ा।"
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