रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान  

रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान
रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान, राजस्थान
विवरण 'रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान' राजस्थान स्थित प्रसिद्ध पर्यटन स्थल है। यह अभयारण्य अपनी खूबसूरती, विशाल परिक्षेत्र और बाघों की मौजूदगी के कारण विश्व प्रसिद्ध है।
राज्य राजस्थान
ज़िला सवाईमाधोपुर
स्थापना 1984
भौगोलिक स्थिति अभयारण्य हाड़ौती के पठार के किनारे पर स्थित है।
प्रसिद्धि बाघ संरक्षित क्षेत्र
कब जाएँ नवम्बर और मई
हवाई अड्डा कोटा, सांगानेर हवई अड्डा, जयपुर
रेलवे स्टेशन सवाईमाधोपुर
संबंधित लेख राजस्थान, राजस्थान पर्यटन, बाघ, रणथम्भौर क़िला
अन्य जानकारी रणथंभौर वन्यजीव अभयारण्य दुनिया भर में बाघों की मौजूदगी के कारण जाना जाता है और भारत में इन जंगल के राजाओं को देखने के लिए भी यह अभयारण्य सबसे अच्छा स्थल माना जाता है।

रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान राजस्थान के सवाईमाधोपुर ज़िले में स्थित है। यह उत्तर भारत के बड़े राष्ट्रीय उद्यानों में गिना जाता है। 392 वर्ग किलोमीटर में फैले इस उद्यान में अधिक संख्या में बरगद के पेड़ दिखाई देते हैं। यह उद्यान बाघ संरक्षित क्षेत्र है। यह राष्ट्रीय अभयारण्य अपनी खूबसूरती, विशाल परिक्षेत्र और बाघों की मौजूदगी के कारण विश्व प्रसिद्ध है। अभयारण्य के साथ-साथ यहाँ का ऐतिहासिक दुर्ग भी पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। लंबे समय से यह राष्ट्रीय उद्यान और इसके नजदीक स्थित रणथंभौर दुर्ग पर्यटकों को विशेष रूप से प्रभावित करता है।

राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा

रणथंभौर उद्यान को भारत सरकार ने 1955 में 'सवाई माधोपुर खेल अभयारण्य' के तौर पर स्थापित किया था। बाद में देशभर में बाघों की घटती संख्या से चिंतित होकर सरकार ने इसे 1973 में 'प्रोजेक्ट टाइगर अभयारण्य' घोषित किया और बाघों के संरक्षण की कवायद शुरू की। इस प्रोजेक्ट से अभयारण्य और राज्य को लाभ मिला और रणथंभौर एक सफारी पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन गया। इसके चलते 1984 में रणथंभौर को राष्ट्रीय अभयारण्य घोषित कर दिया गया। 1984 के बाद से लगातार राज्य के अभयारण्यों और वन क्षेत्रों को संरक्षित किया गया। वर्ष 1984 में 'सवाई मानसिंह अभयारण्य' और 'केवलादेव अभयारण्य' की घोषणा भी की गई। बाद में इन दोनो नई सेंचुरी को भी बाघ संरक्षण परियोजना से जोड़ दिया गया।

सरकार की जागरुकता

बाघों की लगातार घटती संख्या ने सरकार की आंखें खोल दी और लम्बे समय से रणथंभौर अभयारण्य में चल रही शिकार की घटनाओं पर लगाम कसी गई। स्थानीय बस्तियों को भी संरक्षित वन क्षेत्र से धीरे-धीरे बाहर किया जाने लगा। बाघों के लापता होने और उनकी चर्म के लिए बाघों का शिकार किए जाने के मामलों ने देश के चितंकों को झकझोर दिया था। कई संगठनों ने बाघों को बचाने की गुहार लगाई और वर्ष 1991 के बाद लगातार इस दिशा में प्रयास किए गए। बाघों की संख्या अब भी बहुत कम है और अभयारण्यों से अभी भी बाघ लापता हो रहे हैं। ऐसे में वन विभाग को चुस्त दुरूस्त होना ही है, साथ ही उच्च तकनीकि से भी लैस होने की ज़रूरत है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

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