मिलिन्द  

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मिलिन्द या मनेन्दर या मीनेंडर या मेनांडर

मिलिंद (मिनांडर) का सिक्का

मिलिन्द पंजाब पर लगभग 160 ई.पू. से 140 ई.पू. तक राज्य करने वाले यवन राजाओं में सबसे उल्लेखनीय राजा था। इसे मिलिन्द के अतिरिक्त अन्य नामों जैसे- 'मनेन्दर', 'मीनेंडर' या 'मीनांडर' आदि से भी जाना जाता है। इसके विविध प्रकार के बहुत से सिक्के उत्तर भारत के विस्तृत क्षेत्रों में, यहाँ तक की यमुना के दक्षिण में भी मिलते हैं। सम्भव है कि 'गार्गी संहिता' में जिस दुरात्मा वीर यवन राजा द्वारा प्रयाग पर अधिकार करके 'कुसुमपुर' (अर्थात पाटलिपुत्र) में भय उत्पन्न करने का उल्लेख है, वह मिलिन्द ही हो। बौद्ध अनुश्रुतियों के अनुसार उसने बौद्ध धर्म की शरण ले ली थी। प्रसिद्ध बौद्ध ग्रन्थ 'मिलिन्दपन्हों' (मिलिन्द के प्रश्न) में बौद्ध भिक्षु नागसेन के साथ उसके संवादात्मक प्रश्नोत्तर दिये हुए हैं।

राज्य सीमा

मिलिन्द प्रथम पश्चिमी राजा था, जिसने बौद्ध धर्म को अपनाया और मथुरा (उत्तर प्रदेश) पर शासन किया। उसके राज्य की सीमा बैक्ट्रिया, पंजाब, हिमाचल और जम्मू से मथुरा तक था। डेमेट्रियस के समान मिलिन्द नामक यवन राजा के भी अनेक सिक्के उत्तर-पश्चिमी भारत में उपलब्ध हुए हैं। इसकी राजधानी 'शाकल' (सियालकोट) थी। भारत में राज्य करते हुए वह बौद्ध श्रमणों के सम्पर्क में आया और आचार्य नागसेन से उसने बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। मिलिन्द का राज्य यमुना से आमू (वक्षु) दरिया तक फैला हुआ था। यद्यपि उसकी एक राजधानी बलख (वाहलीक) भी थी, किंतु हमारी इस परंपरा के अनुसार मालूम होता है, मुख्य राजधानी सागल (स्यालकोट) नगरी थी।

बौद्ध अनुयायी

प्लूतार्क ने लिखा है कि मिलिन्द बड़ा न्यायी, विद्वान् और जनप्रिय राजा था। उसकी मृत्यु के बाद उसकी हड्डियों पर बड़े-बड़े स्तूप बनवाये गये। मिलिन्द को शास्त्र चर्चा और बहस की बड़ी आदत थी, और साधारण पंडित उसके सामने नहीं टिक सकते थे। बौद्ध ग्रंथों में उसका नाम 'मिलिन्द' आया है। 'मिलिन्द पञ्हो' नाम के पालि ग्रंथ में उसके बौद्ध धर्म को स्वीकृत करने का विवरण दिया गया है। उसके अनेक सिक्कों पर बौद्ध धर्म के 'धर्मचक्र प्रवर्तन' का चिह्न 'धर्मचक्र' बना हुआ है, और उसने अपने नाम के साथ 'ध्रमिक' (धार्मिक) विशेषण दिया है।

मिलिंद (मिनांडर) का सिक्का

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