अध्यात्मवाद  

अध्यात्मवाद उस विचारधारा का नाम है, जिसमें आत्मा को ही सबका मूल माना जाता है। उपनिषदों तथा महाभारत में अध्यात्म शब्द का प्रयोग 'शरीर' के अर्थ में हुआ है, किंतु कालांतर में चैतन्य आत्मतत्त्व के अर्थ में यह शब्द रूढ़ हो गया। पश्चिम में ग्रीक दार्शनिक अफलातून ने सर्वप्रथम इस विषय पर विचार किया। उसने संसार के मूल में अभौतिक तत्त्व की स्थिति मानी और उसे 'इंडिया' (आइडिया) नाम दिया। उसके बाद उन सभी दर्शनों के लिए 'आइडियलिज़्म' शब्द का व्यवहार होने लगा, जिनके अनुसार भौतिक जगत् का मूल अभौतिक तत्त्व है। अध्यात्मवाद और 'आइडियलिज़्म' समानार्थक शब्द हैं।[1]

ज्ञान, ज्ञाता और विषय

ज्ञान जीव को जड़ से पृथक् करता है। ज्ञान के लिए ज्ञान का विषय, ज्ञाता और विषय तथा ज्ञाता का संबंध (ज्ञान) होना आवश्यक है। इनमें से एक के भी अभाव में ज्ञान संभव नहीं है। फिर भी तीनों में से ज्ञाता का स्थान महत्वपूर्ण है, क्योंकि ज्ञाता के अभाव में विषय और संबंध का कोई अर्थ नहीं। यथार्थवादी दार्शनिक ज्ञान को विषय और संबंध से उत्पन्न गुण मानते हैं। किंतु जब विषय जड़ है और ज्ञाता (आत्मा) चेतन है, तब इन दोनों में स्वभावभेद होने के कारण कार्य-कारण-भाव संबंध कैसे हो सकता है? इस प्रश्न के उत्तर में कुछ दार्शनिक आत्मा को भी पृथ्वी, जल आदि की तरह द्रव्य मान लेते हैं और कुछ आत्मा की चेतनता की रक्षा करने के लिए विषय को आत्मा से अभिन्न मानते हैं। किंतु ज्ञाता यदि पृथ्वी आदि की तरह एक पदार्थ है तथा ज्ञान उसका गुण मात्र है तो वह ज्ञाता अपने आप में पत्थर की तरह चेतना शून्य तत्त्व होगा। साथ ही यह भी प्रश्न उठता है कि ज्ञाता स्वयं ज्ञान का विषय नहीं होता है या नहीं। ज्ञाता को भी ज्ञान का विषय मान लेने पर ज्ञाता को जीतने वाले एक अलग ज्ञाता की स्थिति माननी पड़ेगी। इस तरह अलग ज्ञाता मानने का कोई अंत न होगा। यदि ज्ञाता स्वयं भी नहीं जानता तो 'मैं जानता हूँ', इस अनुभव का क्या होगा? इसलिए ज्ञाता को चेतन स्वरूप मानना चाहिए, चेतना और ज्ञाता में गुण-गुणी-संबंध तर्क की दृष्टि से असंगत है।

ज्ञान का मूल आधार

चेतन आत्मा सभी ज्ञान का मूलाधार है। पर इस आत्मा का जड़ विषय के साथ संबंध कैसे संभव है? अध्यात्मवाद में इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए विषय को ज्ञाता से अपृथक् माना गया है। ज्ञान में प्रतिभासित विषय सर्वदा बौद्धिक होता है, पदार्थ अपने भौतिक रूप में ज्ञान के विषय नहीं होते। मानो एक ही आत्मा ज्ञाता और ज्ञेय के रूप में द्विधा विभक्त होकर ज्ञान की उत्पत्ति करती है। विषय और ज्ञाता को एक तत्त्व के ही दो रूप मान लेने पर स्वभावत: बाह्म जगत् का अस्तित्व स्वप्नवत मानना पड़ेगा। किंतु स्वप्न और जाग्रत का अंतर सर्वानुभवसिद्ध है। योगाचर बौद्ध दर्शन तथा गौड़वाद के मत में स्वप्न और जगत् के अनुभव में वास्तविक भेद नहीं है। अत: अध्यात्मवाद के मूल सिद्धांतों में सत्ता के दो या तीन स्तर स्वीकार किए गए हैं। व्यावहारिक रूप से हम जाग्रत अवस्था के अनुभवों को स्वप्नावस्था से पृथक् मानते हैं। इस भेद का मूल कारण है स्वप्न का मिथ्यात्व। वस्तु का जो रूप अनुभूत होता है, कालांतर में उसका अपलाप हो जाता है, इसलिए उसका अनुभवगम्य रूप ही मिलता है।[1]

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. 1.0 1.1 1.2 अध्यात्मवाद (हिंदी)। । अभिगमन तिथि: 15 फ़रवरी, 2014।
  2. अनिर्वचनीयतावाद

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