अट्टालक  

अट्टालक (टॉवर, मीनार) ऐसी संरचना को कहते हैं जिसकी ऊँचाई उसकी लंबाई तथा चौड़ाई के अनुपात में कई गुनी हो, अर्थात्‌ ऊँचाई ही उसकी विशेषता हो। प्राचीन काल में अट्टालकों का निर्माण नगर अथवा गढ़ को सुरक्षा के विचार से किया जाता था, जहाँ से प्रहरी आते हुए शत्रु को दूर से ही देख सकता था। अट्टालकों का निर्माण वास्तुकला की भव्यता तथा प्रदर्शन के विचार से भी किया जाता था। अत इस प्रकार के अट्टालक अधिकतर मंदिरों तथा महलों के मुखद्वार पर बनाए जाते थे। मुखद्वार पर बने अट्टालक गोपुर कहे जाते हैं। मैसोपोटेमिया में ईसा से 2,770 वर्ष पूर्व सैनिक आवश्यकताओं के लिए अट्टालकों के निर्माण के चिन्ह मिलते हैं। मिस्र में भी ऐसे अट्टालकों का आभास मिलता है, परंतु ग्रीस में इसका प्रचलन बहुत कम था। इसके विपरीत रोम में अट्टालकों का निर्माण प्रचुर मात्रा में किया जाता था, जैसा पौंपेई, औरेलियन तथा कुस्तुनतुनिया के ध्वस्त अवशेषों से पता चलता है.भारतवर्ष में भी अट्टालकों का प्रचलन प्राचीन काल से था। गुप्तकालीन मंदिरों के ऊँचे-ऊँचे शिखर एक प्रकार के अट्टालक ही हैं। देवगढ़ के दशावतार मंदिर का शिखर 40 फुट ऊँचा है। नरसिंह गुप्त बालादित्य ने नालंदा में एक बड़ा विशाल तथा सुंदर मंदिर बनवाया जो 300 फुट ऊँचा था।

चीन में भी ईटं अथवा पत्थर के ऊँचे-ऊँचे अट्टालक नगर सीमा के द्वारों पर शोभा तथा सौंदर्य के लिए बनाए जाते थे, जैसे चीन की बृहद् भित्ति (ग्रेट वाल ऑव चाइना) पर अब भी स्थित हैं। इसके अतिरिक्त वहाँ के अट्टालक पैगोडा के रूप में भी बनते थे। गॉथिक काल में जो अट्टालक या मीनारें बनीं वे पहले से भिन्न थीं। पुराने अट्टालकों में एक छोटा-सा द्वार होता था और वे कई मंजिल के बनते थे। इनमें छोटी-छोटी खिड़कियाँ लंबी कर दी गई और साथ में कोने पर के पुश्ते (बटरेस वाल्स) भी खूब ऊँचे अथवा लंबे बनाए जाने लगे, जिनमें छोटे-छोटे बहुत से खसके डाल दिए जाते थे। अधिकांश अट्टालकों के ऊपर नुकीले शिखर रखे जाते थे, पर कुछ में ऊपर की छत चिपटी ही रखी जाती थी तथा कुछ का आकार अठपहला भी रख दिया जाता था। इंग्लैंड का सबसे सुंदर गॉथिक नमूने का अट्टालक कैंटरबरी गिरजा है, जो सन्‌ 1945 में बना था।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 1 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 86,87 |

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