कुंडलिनी  

कुंडलिनी परमेश्वर की चिद्रूपा परमाशक्ति प्रति जीवदेह में सोई पड़ी है। इसका नाम कुंडलिनी या कुलकुंडलिनी शक्ति है। यद्यपि जीव स्वरूपत: शिवरूप हैं, फिर भी जब तक यह शक्ति जगती नहीं तब तक वे आत्मविस्मृत रहते हैं एवं पशु के सदृश वेद्य शक्तियों द्वारा संचालित हो जड़वत स्थित रहते हैं। क्रमविकास के नियमानुसार 84 लाख योनियों का अतिक्रम हो जाने पर जब पशुभाव हटाने योग्य मनुष्यदेह की प्राप्ति होती है तब अहंभाव का उदय और कर्म में अधिकार उत्पन्न होता है। कुंडलिनी शक्ति मानवदेह में मेरु दंड के नीचे मूलाधार नामक चतुर्दश कुलकमल की कर्णिका में त्रिकोशस्थ अधोमुख स्वयंभूलिंग का साढ़े तीन वलयों के रूप में वेष्टन कर अपने मुंह से ब्रह्मद्वार को ढककर सोई हुई है।

दीर्घकालव्यापी तपस्या के प्रभाव से तथा भगवदनुग्रह होने पर इस शक्ति का जागरण होता है। उस समय वह सुप्तावस्था के कुंडलभाव का त्याग कर सरल गति से मेरुदंड के भीतर सषुम्ना नाड़ी का आश्रय पाकर ऊपर की ओर उठने लगती है और इसके साथ ही सत्व का विकास, भोगों में वैराग्य, विवेक, ज्ञान आदि सद्गुणों का आविर्भाव होने लगता है। ध्वन्यात्मक और वर्णात्मक सब प्रकार के शब्दों तथा शुद्ध और अशुद्ध सब प्रकार की सृष्टियों का यही मूल है। यह बिंदु, महामाया तथा चिदाकाश के नाम से आगमों में प्रसिद्ध है। सद्गुरु का अनुग्रह होने पर उनसे प्रेरित चित्‌शक्ति के आघात को प्राप्त होकर यह अनादि निद्रा से जाग उठती है। नाद तथा ज्योति बिखरेती हुई यह मूलाधार से आज्ञाचक्र पर्यंत छह चक्रों का विद्युच्छिखा की भांति उल्लंघन कर भ्रूमध्यस्थ बिंदुस्थान में प्रकट होती है और अंत में ज्ञानचक्षु या तृतीय नेत्र का उन्मीलन करती है। तदुपरांत शिवशक्तिमय माहनाद का भेदकर शखिनी नाड़ी के शिखर में स्थित शून्य स्थान में ब्रह्मरध्रांतर्गत विसर्ग के निम्न प्रदेश में चिंदात्मक चंद्रमंडल में प्रविष्ट हो जाती है। इस मंडल में अत्यंत गुप्त शून्य स्थान में परमबिंदु अवस्थित है। इस महाज्ञान के अवलंबन से परमसंज्ञा के साक्षात्कार का मार्ग खुल जाता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 3 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 47 |

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