एमिली एडवर्ड मोरे  

एमिली एडवर्ड मोरे
एमिली एडवर्ड मोरे
पूरा नाम एमिली एडवर्ड मोरे
कर्म भूमि फ़्राँस तथा भारत
कर्म-क्षेत्र लेखक
भाषा अंग्रेज़ी
विशेष योगदान एमिली एडवर्ड मोरे वह प्रथम व्यक्ति थे, जिन्होंने भारत में सबसे पहले इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर बुक स्टॉल लगाया था। इन्होंने भारत के सबसे बड़े बुकस्टोर चेन ‘ए.एच. व्हीलर’ की नींव रखी थी।
नागरिकता फ़्राँसीसी
अन्य जानकारी एमिली एडवर्ड मोरे ने 'हाउस ऑफ़ व्हीलर्स' नामक प्रकाशन कंपनी भी खोली। इसी से लेखक रूडयार्ड किपलिंग, जिन्होंने बहुचर्चित 'जंगल बुक' लिखी थी कि कहानियों का पहला संग्रह ‘प्लेन ऑक्स फ्रॉम द हिल’ छापा।
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एमिली एडवर्ड मोरे (अंग्रेज़ी: Emili Edward Moreau) एक फ़्राँसीसी लेखक थे, जिन्होंने भारत के सबसे बड़े बुकस्टोर चेन ‘ए.एच. व्हीलर’ की नींव रखी थी। भारत के लगभग हर रेलवे स्टेशन पर मौजूद, उपन्यास, पुस्तकें एवं पत्र-पत्रिकाएं बेचने वाले इस स्टॉल की कहानी काफ़ी रोचक है। इस समय भारत के 258 रेलवे स्टेशनों पर ए.एच. व्हीलर के स्टॉल हैं।

'ए.एच. व्हीलर' की नींव

इलाहाबाद रेलवे स्टेशन से शुरू हुई ए.एच. व्हीलर कंपनी की नींव लेखक एमिली एडवर्ड मोरे ने अपने दोस्त टी.के. बनर्जी के साथ 1877 में रखी थी। मोरे को किताबों का बहुत शौक था। घर में किताबें इधर-उधर बिखरी रहती थीं। एक दिन उनकी पत्नी ने गुस्से में आकर चेतावनी दे दी कि किताबें नहीं हटाई तो उन्हें बाहर फेंक दूंगी। पत्नी की चेतावनी से परेशान मोरे ने अपने दोस्त टी.के. बनर्जी के सहयोग से रेलवे अधिकारियों से अनुमति ली और इलाहाबाद रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर एक चादर बिछाकर अपनी पुरानी किताबों को भारी छूट पर बेचना शुरू कर दिया। पहले ही दिन थोड़ी देर में सारी किताबें बिक गईं। ये सिलसिला पांच दिनों तक चलता रहा और इस प्रकार मोरे व बनर्जी किताब बेचने वाले बन गए। कुछ दिनों बाद उन्होंने एक कंपनी बना ली। बाद में उन्होंने कंपनी का एक प्रतिशत शेयर देकर लंदन की कंपनी 'ए.एच. व्हीलर' का ब्रांड नेम ख़रीद लिया। उसी साल दोनों दोस्तों ने इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर अपना पहला स्टोर खोल दिया। इसमें 59 प्रतिशत हिस्सा मोरे, 40 प्रतिशत टी.के. बनर्जी और एक प्रतिशत हिस्सा आर्थ हेनरी व्हीलर[1] के दामाद मार्टिन ब्रांड का था। टी.के. बनर्जी को कंपनी का हिस्सेदार होने के साथ कंपनी के एकाउंटेंट की भूमिका भी निभानी पड़ती थी।

कंपनी का विस्तार

कंपनी का दूसरा स्टोर हावड़ा रेलवे स्टेशन और तीसरा नागपुर स्टेशन पर खोला गया। धीरे-धीरे कंपनी का नेटवर्क बढ़ता गया। 1930 में टी.के. बनर्जी 100 प्रतिशत शेयर लेकर कंपनी के मालिक हो गए। टी.के. बनर्जी के परपोते और वर्तमान में कंपनी के निदेशक अमित बनर्जी ने बताया कि विभाजन से पहले पाकिस्तान में भी इस कंपनी के कई स्टोर थे, लेकिन बाद में वहां की सारी दुकानें बंद कर दी गईं।

दस हज़ार लोगों को नौकरी

ए.एच. व्हीलर एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड ने 10 हज़ार से अधिक लोगों को नौकरी दे रखी है। कंपनी की 78 फीसदी कमाई न्यूजपेपर और मैगजीन से होती है। 20 प्रतिशत कमाई किताबों और दो फीसदी का कमाई का जरिया सरकारी प्रकाशन और टाइम टेबल से होती है।

रुडयार्ड किपलिंग को दी पहचान

ए.एच. व्हीलर ने अंग्रेज़ी के जाने-माने लेखक रुडयार्ड किपलिंग को भी पहचान बनाने में काफ़ी मदद की। अमित बनर्जी के अनुसार- कंपनी ने 1888 में किपलिंग की पहली किताब का प्रकाशन किया। उस वक्त किपलिंग को लेखक के रूप में पहचान नहीं मिल सकी थी।[2] एमिली एडवर्ड मोरे द्वारा स्थापित 'ए.एच. व्हीलर एंड कंपनी' का काम धीरे-धीरे बढ़ता गया था। रेलवे के विस्तार के साथ ही इस कंपनी का भी विस्तार होने लगा। एमिली एडवर्ड मोरे ने 'हाउस ऑफ़ व्हीलर्स' नामक प्रकाशन कंपनी भी खोली। इसी से लेखक रूडयार्ड किपलिंग, जिन्होंने बहुचर्चित 'जंगल बुक' लिखी थी कि कहानियों का पहला संग्रह ‘प्लेन ऑक्स फ्रॉम द हिल’ छापा। इंडियन रेलवे लाइब्रेरी सीरीज के तहत छह कहानियों के संग्रह वाली इस किताब का दाम एक रुपया था। करीब 25 साल तक ए.एच. व्हीलर के ग्राहकों व कर्मचारियों में सिर्फ अंग्रेज़ व एंग्लो इंडियन लोग ही हुआ करते थे।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. ए.एच. व्हीलर
  2. मियां-बीवी के झगड़े ने रखी एएच व्हीलर की नींव (हिन्दी) हिन्दुस्तान लाइव। अभिगमन तिथि: 25 अगस्त, 2015।
  3. विनम्र। एएच व्हीलर की अजीब दास्तान (हिन्दी) नया इंडिया। अभिगमन तिथि: 25 अगस्त, 2015।

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