कीटविज्ञान  

कीटविज्ञान एंटोमॉलोजी

Entomology प्राणिविज्ञान का एक अंग है जिसके अंतर्गत कीटों अथवा षट्पादों का अध्ययन आता है। षट्पाद (षट्=छह, पाद=पैर) श्रेणी को ही कभी-कभी कीट की संज्ञा देते हैं। कीट की परिभाषा यह की जाती है कि यह वायुश्वसनीय संधिपाद प्राणी (Arthropod) है, जिसमें सिर, वक्ष और उदर स्पष्ट होते हैं; एक जोड़ी श्रृंगिकाएं (Antenna) तीन जोड़े, पैर और वयस्क अवस्था में प्राय: एक या दो जोड़े पंख होते हैं। कीटों में अग्रपाद कदाचित्‌ ही क्षीण होते हैं। कीट की उत्पत्ति बहुत प्राचीन है, क्योंकि वे कार्बनप्रद (Carbonniferous) युग में तो निश्चित रूप से ही वर्तमान थे और संभवत: इससे भी पूर्व रहे हों।

1930 ई0 तक 10,400 जीवाश्म (Fossil) कीटों का वर्णन किया जा चुका था और तब से अब तक अन्य अनेक कीट इस सूची में जोड़े जा चुके हैं। वर्तमान जातियों (Species) की संख्या लगभग 6,40,000 हैं। ऐसा अनुमान है कि यदि सभी का उल्लेख किया जाए तो उनकी संख्या 20,00,000 तक पहुँच जाएगी। कीट न्यूनाधिक सब क्षेत्रों में पाए जाते हैं।

अनेक सामाजिक कीटों का कुल बड़ा होता है। रानी मधुमक्खी में प्रति दिन 4,000 अंडे देने की क्षमता होती है और बसंत ऋ तु में एक छत्ते में 40,000 से 50,000 तक मक्खियाँ होती हैं। चीटियों की बड़ी बस्ती में 5,00,000 चींटियां पाई जाती हैं। एक टिड्डी दल में तो लाखों, करोड़ों की संख्या रहती है। एक प्रतिवेदन के अनुसार किसी टिड्डी दल के आक्रमण के समय 15,000 एकड़ भूमि में कीट फैल गए थे और इतने विस्तृत क्षेत्र की फसल सात या आठ घंटों में चट कर गए थे।

मादा कीट प्राय: बड़ी संख्या में अंडे देती है और अंडे अद्भुत ढंग से सुरक्षित रहते हैं। अधिकांश कीटों का जीवनचक्र छोटा होता है। बहुसंख्यक कीट एक साल में वयस्क हो जाते हैं और कितनों की तो एक ऋ तु में ही अनेक पीढ़ियाँ तैयार हो जाती हैं। कुछ कीटों में अनिषेकजनन (Parthenogenesis) होता है। सेसिडोमिडी (Cecidomyidae) में अनिषेकजनन की एक अनूठी विधि है जिसे पीडोजेनेसिस (Paedogenesis) कहते हैं।

साधारण कीट छोटे होते हैं, पर बड़े बड़े कीट भी पाए जाते हैं। सबसे बड़ा जीवित कीट इरिबस एग्रीपीना (Erebus agrippina) है। यह एक प्रकार का शलभ (Moth) है। यह ब्राज़ील में पाया जाता है। इसके पंख का फैलाव ग्यारह इंच होता है।

कीट विज्ञान की कई शाखाएँ हैं, जिनमें आर्थिक (Economic) कीटविज्ञान प्रमुख शाखाओं में से एक है। इसके अंतर्गत लाभकर और हानिकारक कीटों का अध्ययन आता है। इसमें कीटों का नियंत्रण, उनकी संख्या में कमी करना, विरल क्षतिकर्ता जातियों का विलोपण, लाभदायक कीटों का विस्तार और सुंदर एवं निर्दोष कीटों का अधिमूल्यन (appreciation) सम्मिलित हैं। 6,40,000 कीट जातियों में से 10,000 जातियाँ ही क्षति पहुँचानेवाली हैं। कुछ कीड़े विनाशकारी हैं। इनका नियंत्रण परमावश्यक होते हुए भी प्राय: कठिन और खर्चीला होता हैं।

आर्थिक कीटविज्ञान के कई भाग हैं, यथा : क विनाशकारी कीटों की पहचान, ख जातियों के स्वभाव का अध्ययन, जिससे उनके जीवनचक्र का कोई भेद या रहस्य ज्ञात हो सके; ग नियंत्रण विधि का निर्धारण एवं घ उपलब्ध ज्ञान के फल का उत्पादकों और कृषकों में प्रसार।

बहुत से कीट मानव रोगों के प्राथमिक अथवा माध्यमिक पोषक (host) या वाहक का काम करते हैं। अनेक प्रकार के जीवाणुओं, जैसे प्रोटोज़ोआ (Protozoa), केंचुए (Nematodas) और विषाणुओं (Viruses) इत्यादि का प्रसार कीटों द्वारा होता है। मानव रोगों में शीतज्वर (मलेरिया) अधिक गंभीर कीटजनित बीमारी है। प्लेग के विषाणु बैसिलस पेस्टिस (Bacillus pestis) का प्रसार फुदककीट (फ्ली Flea), द्वारा ही मनुष्यों, चूहों तथा अन्य कुतरनेवाले प्राणियों में होता हैं। 1914 ई. में भारत में प्लेग से 1,98,875 लोगों की मृत्यु हुई थी।

टाइफ़ाइड ज्वर बैक्टीरिया जनित बीमारी है। इसकी छूत कई प्रकार से लग सकती है। घरेलू मक्खी इस रोग का मुख्य प्रसारक समझी जाती है। अनेक प्रकार के फीताकृमि (Tapaworm) अपने जीवनेइतिहास का कुछ अंश कीटों के शरीर में व्यतीत करते हैं। अन्य अनेक रोगों का प्रसार भी कीटों द्वारा होता है।

उष्ण प्रदेशों में निद्रालु रोग (Sleeping sickness) त्सेत्सि (Tsetse) मक्खी द्वारा और फीलपाँव (Elephantisis) मच्छरों द्वारा फैलता है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. हिन्दी विश्वकोश, खण्ड 3 |प्रकाशक: नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 32 |
और पढ़ें

वर्णमाला क्रमानुसार लेख खोज

                              अं                                                                                                       क्ष    त्र    ज्ञ             श्र   अः



"http://m.bharatdiscovery.org/w/index.php?title=कीटविज्ञान&oldid=633835" से लिया गया