आयुर्विज्ञान  

आयुर्विज्ञान विज्ञान की वह शाखा है, जिसका संबंध मानव शरीर को निरोग रखने, रोग हो जाने पर रोग से मुक्त करने अथवा उसका निदान करने तथा आयु बढ़ाने से है। भारत आयुर्विज्ञान का जन्मदाता है। अपने प्रारम्भिक समय में आयुर्विज्ञान का अध्ययन जीव विज्ञान की एक शाखा के समान ही किया गया था। बाद में 'शरीर रचना' तथा 'शरीर क्रिया विज्ञान' आदि को इसका आधार बनाया गया।

जन्म

आयुर्विज्ञान का जन्म भारत में कई हज़ार वर्ष ई.पू. में हुआ था, परंतु पाश्चात्य विद्वानों का मत है कि वैज्ञानिक आयुर्विज्ञान का जन्म ई.पू. चौथी शताब्दी में यूनान में हुआ था और लगभग 600 वर्ष बाद उसकी मृत्यु रोम में हुई। इसके लगभग 1500 वर्ष पश्चात् विज्ञान के विकास के साथ उसका पुनर्जन्म हुआ। यूनानी आयुर्वेद का जन्मदाता 'हिप्पोक्रेटीज़' था, जिसने उसको आधिदैविक रहस्यवाद के अंधकूप से निकालकर अपने उपयुक्त स्थान पर स्थापित किया। उसने बताया कि रोग की रोकथाम तथा उससे मुक्ति दिलाने में देवी-देवताओं का हाथ नहीं होता है। उसने तांत्रिक विश्वासों और वैसी चिकित्सा का अंत कर दिया। उसके पश्चात् गत शताब्दियों में समय-समय पर अनेक खोजकर्ताओं ने नवीन खोजें करके इस विज्ञान को और भी उन्नत किया।

प्रारम्भिक अध्य्यन तथा खोजें

शुरुआत में आयुर्विज्ञान का अध्ययन जीव विज्ञान की एक शाखा की भाँति किया गया और 'शरीर रचना विज्ञान'[1] तथा 'शरीर क्रिया विज्ञान'[2] को इसका आधार बनाया गया। शरीर में होने वाली क्रियाओं के ज्ञान से पता लगा कि उनका रूप बहुत कुछ रासायनिक है और ये घटनाएँ रासानिक क्रियाओं के फल हैं। जैसे-जैसे खोजें होती गईं, वैसे-वैसे ही शरीर की घटनाओं का रासायनिक रूप सामने आता गया। इस प्रकार रसायन विज्ञान का इतना महत्व बढ़ा कि वह आयुर्विज्ञान की एक पृथक् शाखा बन गया, जिसका नाम 'जीव रसायन'[3] रखा गया। इसके द्वारा न केवल शारीरिक घटनाओं का रूप स्पष्ट हुआ, अपितु रोगों की उत्पत्ति तथा उनके प्रतिरोध की विधियाँ भी निकल आईं। साथ ही भौतिक विज्ञान ने भी शारीरिक घटनाओं को भली-भाँति समझने में बहुत सहायता दी। यह ज्ञात हुआ कि अनेक घटनाएँ भौतिक नियमों के अनुसार ही होती हैं। अब जीव रसायन की भाँति जीव भौतिकी[4] भी आयुर्विज्ञान का एक अंग बन गई और उससे भी रोगों की उत्पत्ति को समझने में तथा उनका प्रतिरोध करने में बहुत सहायता मिली। विज्ञान की अन्य शाखाओं से भी रोगरोधन तथा चिकित्सा में बहुत सहायता मिली है, और इन सबके सहयोग से मनुष्य के कल्याण में बहुत प्रगति हुई है, जिसके फलस्वरूप मानव का जीवनकाल बढ़ गया है।

विभाजन

शरीर, शारीरिक घटनाओं और रोग संबंधी आंतरिक क्रियाओं का सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त करने में अनेक प्रकार की प्रायोगिक विधियों और यंत्रों से, जो समय-समय पर बनते रहे, उनसे बहुत सहायता मिली है। किंतु इस गहन अध्ययन का परिणाम यह हुआ कि आयुर्विज्ञान अनेक शाखाओं में विभक्त हो गया और प्रत्येक शाखा में इतनी खोज हुई है, नवीन उपकरण बने हैं तथा प्रायोगिक विधियाँ ज्ञात की गई हैं कि कोई भी विद्वान् या विद्यार्थी उन सब से पूर्णतया परिचित नहीं हो सकता है। दिन-प्रतिदिन चिकित्सक को प्रयोगशालाओं तथा यंत्रों पर निर्भर रहना पड़ता है और यह निर्भरता उत्तरोत्तर बढ़ती ही जा रही है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. अनैटोमी
  2. फ़िज़िऑलॉजी
  3. बायोकेमिस्ट्री
  4. बायोफ़िज़िक्स
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