मुहम्मद  

(हज़रत मुहम्मद से पुनर्निर्देशित)


Disamb2.jpg मुहम्मद एक बहुविकल्पी शब्द है अन्य अर्थों के लिए देखें:- मुहम्मद (बहुविकल्पी)
मुहम्मद
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पूरा नाम अबू अल्‌-क़ासिम मुहम्मद इब्न अब्द अल्लाह इब्न अब्द अल्‌-मुत्तलिब इब्न हाशिम इब्न अब्द मनाफ़ इब्न क़ुसइ इब्न किलाब
अन्य नाम हज़रत मुहम्मद
जन्म 570 ई.
जन्म भूमि मक्का, अरब
मृत्यु 632 ई.
मृत्यु स्थान मदीना, अरब
अभिभावक अब्द अल्ह इब्न अब्द अल मुतल्लिब (अब्दुल्लाह) और आमना (अमीना बिन बहाब)
पति/पत्नी ख़दीजा, आयशा, हफ़सा, सौदा, 'उम्म सल्मा, ज़ैनब, उम्म हबीबी, जुवेरिया, रमलाह, रिहाना, मारिया, मैमूना, सफ़िया (13 पत्नियाँ)
संतान पुत्र: अल-क़ासिम, अब्द अल्लाह, इब्राहिम
पुत्री: फ़ातिमा, ज़ैनब बिन मुहम्मद, उम्म बिन मुहम्मद, रुक़या बिन मुहम्मद
प्रसिद्धि इस्लाम धर्म के सबसे महान् नबी और आखिरी पैग़म्बर माने जाते हैं।

हज़रत मुहम्मद साहब (जन्म- 570 ई., मक्का, अरब; मृत्यु- 632 ई., मदीना) अरब के एक प्रसिद्ध धर्माचार्य और इस्लाम के प्रवर्तक थे। क़ुरआन ने कहीं भी हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) को ‘इस्लाम धर्म का प्रवर्तक’ नहीं कहा है। क़ुरआन में हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) का परिचय नबी (ईश्वरीय ज्ञान की ख़बर देने वाला), रसूल (मानवजाति की ओर भेजा गया), रहमतुल्-लिल-आलमीन (सारे संसारों के लिए रहमत व साक्षात् अनुकंपा, दया), हादी (सत्यपथ-प्रदर्शक) आदि शब्दों से कराया है। स्वयं पैग़म्बर मुहम्मद (सल्ल.) ने इस्लाम धर्म के ‘प्रवर्तक’ होने का न दावा किया, न इस रूप में अपना परिचय कराया।

इनका पूरा नाम 'अबू अल्‌-क़ासिम मुहम्मद इब्न अब्द अल्लाह इब्न अब्द अल्‌-मुत्तलिब इब्न हाशिम इब्न अब्द मनाफ़ इब्न क़ुसइ इब्न किलाब' था।

हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के एक कथन के अनुसार ‘इस्लाम के भव्य भवन में एक ईंट की कमी रह गई थी, ईशदूतत्त्व द्वारा वह कमी पूरी हो गई और इस्लाम अपने अन्तिम रूप में सम्पूर्ण हो गया’ (आपके कथन का भावार्थ।) इससे सिद्ध हुआ कि हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) इस्लाम धर्म के प्रवर्तक नहीं हैं। (इसका प्रवर्तक स्वयं अल्लाह है, न कि कोई भी पैग़म्बर, रसूल, नबी आदि)। और हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने उसी इस्लाम का आह्वान किया जिसका, इतिहास के हर चरण में दूसरे रसूलों ने किया था। इस प्रकार इस्लाम का इतिहास उतना ही प्राचीन है जितना मानवजाति और उसके बीच नियुक्त होने वाले असंख्य रसूलों के सिलसिले (शृंखला) का इतिहास।[1]

जीवन परिचय

हज़रत मुहम्मद का जन्म मक्का में 570 ई. में हुआ और मृत्यु 632 ई. में मदीना नाम के नगर में हुई। वह अमीना के गर्भ से उत्पन्न अब्दुल्ला के पुत्र थे।[2] जन्म के पूर्व ही पिता की और पाँच वर्ष की आयु में माता की मृत्यु हो जाने के फलस्वरूप मोहम्मद साहब का पालन-पोषण उनके दादा मुतल्लिब और चाचा अबू तालिब ने किया था। 25 वर्ष की आयु में उन्होंने ख़दीजा नामक एक विधवा से विवाह किया। मोहम्मद साहब के जन्म के समय अरबवासी अत्यन्त पिछडी, क़बीलाई और चरवाहों की ज़िन्दगी बिता रहे थे। अतः मुहम्मद साहब ने उन क़बीलों को संगठित करके एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने का प्रयास किया। 15 वर्ष तक व्यापार में लगे रहने के पश्चात् वे कारोबार छोड़कर चिन्तन-मनन में लीन हो गये। मक्का के समीप हिरा की चोटी पर कई दिन तक चिन्तनशील रहने के उपरान्त उन्हें देवदूत जिबरील का संदेश प्राप्त हुआ कि वे जाकर क़ुरान शरीफ़ के रूप में प्राप्त ईश्वरीय संदेश का प्रचार करें। तत्पश्चात् उन्होंने इस्लाम धर्म का प्रचार शुरू किया। उन्होंने मूर्ति पूजा का विरोध किया, जिससे मक्का का पुरोहित वर्ग भड़क उठा और अन्ततः मुहम्मद साहब ने 622 ई. को मक्का छोड़कर वहाँ से 300 किलोमीटर यसरिब (मदीना) की ओर कूच कर दिया। उनकी यह यात्रा इस्लाम में 'हिज़रत' कहलाती है। इसी दिन से 'हिजरी संवत' का प्रारम्भ माना जाता है। कालान्तर में 630 ई. में अपने लगभग 10 हज़ार अनुयायियों के साथ मुहम्मद साहब ने मक्का पर चढ़ाई करके उसे जीत लिया और वहाँ इस्लाम को लोकप्रिय बनाया। दो वर्ष पश्चात् 632 ई. को उनका निधन हो गया।

जन्म

इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हज़रत मुहम्मद साहब थे, जिनका जन्म 570 ई. को सउदी अरब के मक्का नामक स्थान में कुरैश क़बीले के अब्दुल्ला नामक व्यापारी के घर हुआ था। ऐसे अन्धकार के समय अरब के प्रधान नगर बक्का (मक्का) में अब्दुल्मतल्लब के पुत्र की भार्या 'आमना' के गर्भ से स्वनामधन्य महात्मा मुहम्मद 617 विक्रम संवत में उत्पन्न हुए। इनका वंश ‘हाशिम’ वंश के नाम से प्रसिद्ध था। जब यह गर्भ में थे तभी इनके पिता स्वर्गवासी हुए। माता और पितामह का बालक पर असाधारण स्नेह था। एक स्थान से दूसरे स्थान पर घूमने वाले बद्दू लोगों की स्त्रियों को पालने के लिए अपने बच्चों को दे देना मक्का के नागरिकों की प्रथा थी। एक समय ‘साद’ वंश की एक बद्दू स्त्री ‘हलीमा’ मक्का में आई। उनको कोई और बच्चा नहीं मिला था जिससे जब धनहीन ‘आमना’ ने अपने पुत्र को सौपने को कहा, तो उसने यह समझ कर स्वीकार कर लिया कि ख़ाली हाथ जाने से जो ही कुछ पल्ले पड़ जाय, वही अच्छा। हलीमा ने एक मास के शिशु मुहम्मद को लेकर अपने डेरे को प्रस्थान किया। इस प्रकार बालक मुहम्मद 4 वर्ष तक बद्दू-गृह में पलता रहा। इसके बाद वह फिर अपनी स्नेहमयी माता की गोद में आया। एक समय सती ‘आमना’ ने कुटुम्बियों से भेंट करने के लिए बालक मुहम्मद के साथ अपने मायके ‘मदीना’ को प्रस्थान किया।

मौहतरमा आमना का स्वर्गारोहण

मदीना से लौटने पर मार्ग में ‘अव्बा’ नामक स्थान पर पितृछाया-विहीन बालक मुहम्मद को अमृततुल्य मातृ-करस्पर्श से भी वंचित कर देवी ‘आमना’ ने स्वर्गारोहण किया। बहू और पुत्र के वियोग से खिन्न पितामह ‘अब्दुल्मतल्लब’ ने वात्सल्यपूर्ण हृदय से पौत्र के पालन-पोषण का भार अपने ऊपर लिया, किन्तु भाग्य को यह भी स्वीकृत नहीं था और मुहम्मद को 8 वर्ष का छोड़कर वह भी काल के गाल में चले गये। मरते समय उन्होंने अपने पुत्र ‘अबूतालिब’ को बुला कर करुण स्वर में आदेश दिया कि मातृ-पितृ-विहीन वत्स मुहम्मद को पुत्र समान जानना।

महात्मा मुहम्मद ने ‘अबूतालिब’ को प्रेमपूर्ण अभिभावकता में कभी वन में ऊँट-बकरी चराते तथा कभी साथियों के साथ खेलते-कूदते अपने लड़कपन को सानन्द बिताया। जब वह 12 वर्ष के थे और उनके चाचा व्यापार के लिए बाहर जाने वाले थे, तब उन्होंने साथ चलने के लिए बहुत आग्रह किया। चाचा ने मार्ग के कष्ट का ख्याल कर इसे स्वीकार न किया। जब चाचा ऊँट लेकर घर से निकलने लगे, तो भतीजे ने ऊँट की नकेल पकड़ कर रोते हुए कहा- “चाचाजी, न मेरे पिता हैं, न माँ। मुझे अकेले छोड़ कर कहाँ जाते हो। मुझे भी साथ ले चलो।" इस बात से अबूतालिब का चित्त इतना द्रवित हुआ कि वह अस्वीकार न कर सके और साथ ही मुहम्मद को भी लेकर ‘शाम’ की ओर प्रस्थित हुए। इसी यात्रा में बालक ने खीष्ठ-तपोधन ‘बहेरा’ का प्रथम दर्शन पाया।

महात्मा मुहम्मद के विवाह

जन-प्रवाद है कि असाधारण प्रतिभाशाली महात्मा मुहम्मद आजीवन अक्षर-ज्ञान से रहित रहे। व्यवहार-चतुरता, ईमानदारी आदि अनेक सद्गुणों के कारण कुरैश-वंश की एक समृद्धिशालिनी स्त्री ‘खदीजा’ ने अपना गुमाश्ता बनाकर 25 वर्ष की अवस्था में नवयुवक मुहम्मद से ‘शाम’ जाने के लिए कहा। उन्होंने इसे स्वीकार कर बड़ी योग्यतापूर्वक अपने कर्तव्य का निर्वाह किया। इसके कुछ दिनों बाद ‘खदीजा’ ने उनके साथ ब्याह करने की इच्छा प्रकट की। यद्यपि ‘खदीजा’ की अवस्था 40 वर्ष की थी, उसके दो पति पहले भी मर चुके थे, किन्तु उसके अनेक सद्गुणों के कारण महात्मा मुहम्मद ने इस प्रार्थना को स्वीकार कर लिया।

कितने ही नए मुसलमान महात्मा पर अपने मुसलमान हो जाने का आभार (इहसान) रखते थे। जिस पर कहा गया है— "तुझ पर इहसान रखते हैं कि मुसलमान हो गए, कह-मुझ पर इहसान मत रखो, यह परमेश्वर ने तुम्हारे ऊपर उपकार किया है कि तुमको सच्चा रास्ता दिया।[3]

महात्मा मुहम्मद का प्रथम विवाह श्रीमती ख़दीजा के साथ 25 वर्ष की अवस्था में हुआ। विवाह के अनन्तर वह 25 वर्ष तक जीवित रहीं। मदीना प्रवास से 3 वर्ष पूर्व, जबकि महात्मा 50 वर्ष के हो गए थे, उनका स्वर्गवास हुआ। इस्लाम की शिक्षा सर्वप्रथम इन्होंने स्वीकार की। कई चरणों से मजबूर होकर महात्मा को (प्रायः) दस विवाह और करने पड़े, किन्तु यह सब 53 वर्ष की अवस्था के बाद हुए। पर महात्मा के पास एक 'जैद' नाम का दास रहता था। उसके मुसलमान हो जाने पर उन्होंने इतना ही नहीं कि उसे दासता से मुक्त कर दिया, प्रत्युत अपना पोष्य पुत्र बनाकर उसका विवाह अपनी फूफी, 'उमैया' की लड़की 'जैनब' से करा दिया। जैनब की बड़ी–बड़ी इच्छाओं और उच्च–वंश के अभिमान ने दासता से मुक्त जैद के साथ पटरी न जमने दी। दोनों में बराबर झगड़ा होने लगा। अनेक बार जैद ने सम्बन्ध विच्छेद (=तलाक़) करना चाहा, किन्तु बार–बार महात्मा 'अपनी स्त्री को अपने पास रहने दे और अल्लाह से डर'- कहकर उसे रोक दिया करते थे, यद्यपि बार–बार परीक्षा ने उन्हें निश्चित कर दिया था कि इन दोनों का मन मिलना कठिन है। किन्तु सम्बन्ध–विच्छेद से उत्पन्न होने वाली कठिन समस्या को देखकर वह इसी तरह टालते जाते थे। 'जैनब' और उसके भाई मुसलमान होने के कारण 'क़ुरैशियों' के कोप–भाजन बने हुए थे और उन्होंने भी घर–बार छोड़कर 'मदीना' में प्रवास किया था। तलाक़ देने पर 'जैनब' का विवाह होना कठिन था। मुसलमान होने से मुसलमान भिन्न के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता था और मुसलमान में भी क़ुरैश के वंश की प्रतिष्ठा के ख्याल से किसी अक़ुरैशी से विवाह अयुक्त था, यद्यपि इससे बहुत पहले ही आदेश मिल चुका था—

"भगवान ने पोष्य पुत्रों को तुम्हारा पुत्र नहीं बनाया, यह तुम्हारी कपोल- कल्पना है।"[4]

इससे जैनब के साथ विवाह करने में इस्लाम धर्म के अनुसार कोई बाधा न थी, परन्तु महात्मा लोकापवाद से डरते थे। लोग कहेंगे- मुहम्मद ने अपनी पतोहू घर में रख ली, किन्तु इस्लाम के प्रवर्त्तक की यह निर्बलता बहुत हानिकर होती यदि वह उस शिक्षा को लोकापवाद से डरकर छोड़ देते जिसके कि वह स्वयं प्रचारक थे। फिर तो उनके अनुयायी क्यों न बर्हिर्मुख हो जाते। इसीलिए क़ुरान ने आदेश दिया।

महात्मा मुहम्मद की पत्नियाँ
'भगवान से डर, तू जो कुछ अपने भीतर छिपाना चाहता था, भगवान उसे प्रकाशित करना चाहता है। तू मनुष्यों से डरता है, किन्तु परमेश्वर से डरना ही सर्वोत्तम है।
जब 'जैद' की उससे इच्छा पूर्ण हो गई तो हम (ईश्वर) ने जैनब को तुझे ब्याह दिया। यह इसलिए कि मुसलमानों पर अपने मौखिक पुत्रों की स्त्रियों से ब्याह करने में हरज न हो।'[5]

मदीना प्रवास से पहले महात्मा ने एक ही ब्याह किया था। यह था श्रीमती 'ख़दीजा' के साथ। वह प्रवास से 3 वर्ष पूर्व ही स्वर्गवासिनी हो गई थीं। बाकी विवाह, जो मदीना में आने पर 53 वर्ष के बाद हुए, उनकी संख्या 9 से अधिक बतलायी जाती है। प्रधान स्त्रियों के नाम हैं—

  • श्रीमती 'आयशा' द्वितीय ख़लीफ़ा 'अबूबकर की पुत्री'।
  • श्रीमती 'हफ़सा' तृतीय ख़लीफ़ा 'उमर' की पुत्री।
  • श्रीमती 'सौदा'।
  • श्रीमती 'उम्म सल्मा'।
  • श्रीमती 'जैनब'।
  • श्रीमती 'उम्म हबीबी'।
  • श्रीमती 'जवेरिया'।
  • श्रीमती 'मैमूना'।
  • श्रीमती 'सफ़िया'।

इनमें से पहली छः क़ुरैश वंश की थीं। आत्मरक्षा के लिए सब तरह से हारकर मुसलमानों ने तलवार की शरण ली। उन्हें इस्लाम के शत्रुओं- क़ुरैश और उनके साथी यहूदियों से अनेक लड़ाइयाँ लड़नी पड़ीं। जिनमें अनेक मुसलमान वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी स्त्रियाँ विधवा हो गईं। अब उनके पालन-पोषण का सवाल उठा। मुसलमानों की संख्या कम थी और उतने ही में प्रबन्ध करना था। इस छोटी-सी बिरादरी के साथ सम्बन्ध की अनिवार्यता ने महात्मा मुहम्मद को और भी मज़बूत किया कि वह उन विधवाओं और उनके सम्बन्धियों को सन्तुष्ट करने के लिए और भी शादियाँ करें। ऐसी ही कठिनाइयों में 'ख़ुनैस' की विधवा 'हफ़सा', 'अब्दुल्ला' की विधवा 'जैनब' और 'अबूसल्मा' की विधवा 'उम्म सल्मा' से विवाह करना, 'उबैदुल्ला' की विधवा 'उम्म हबीबा', से भी उपर्युक्त कारणों से ब्याह हुआ। जो तीन विवाह क़ुरैश- भिन्न वंशों में हुए, वह भी लड़ाकू सरदारों को ब्याह- सम्बन्ध से शान्त रखने के लिए हुए थे। श्री 'अबूबकर' के आग्रह ने 'आयशा' से ब्याह करने पर मजबूर किया। इन सब बातों से यह भली प्रकार पता चल सकता है कि महात्मा ने यह अनेक ब्याह विषय-भोग के लिए नहीं, किन्तु अन्य ही किन्हीं सदिच्छाओं से प्रेरित होकर किया। प्रेरित मुहम्मद के अपने ब्याह के विषय में क़ुरान की निम्न प्रकार की आज्ञा है।

टीका टिप्पणी और संदर्भ

  1. इस्लाम का इतिहास (हिन्दी) इस्लाम धर्म। अभिगमन तिथि: 2 दिसंबर, 2010
  2. पौराणिक कोश |लेखक: राणा प्रसाद शर्मा |प्रकाशक: ज्ञानमण्डल लिमिटेड, वाराणसी |संकलन: भारत डिस्कवरी पुस्तकालय |पृष्ठ संख्या: 563, परिशिष्ट 'घ' |
  3. 49:2:7
  4. 33:1:4
  5. 33:5:6
  6. ‘अलल्-हुब्ल’
  7. प्रत्येक अध्याय में अनेक ‘रकूअ’ और प्रत्येक ‘रकूअ’ में अनेक ‘आयते’ होती हैं।
  8. 3:15:1
  9. मूसा को दिया गया ईश्वरीय ग्रन्थ, यहूदियों की धर्म पुस्तक।
  10. ईसा को दिया गया ईश्वरीय ग्रन्थ, ईसाईयों की धर्म पुस्तक।
  11. 7:20:1
  12. 46:1:9
  13. 48:1:10
  14. 49:1:2
  15. 33:7:4
  16. 61:1:6
  17. 74:1:1:2
  18. 4:8:9
  19. 49:2:5
  20. 2:2:6
  21. 9:42
  22. 17:1:1
  23. 53:1:13-15,18
  24. एक प्रकार के देवता
  25. 46:4:3
  26. 54:1:1
  27. 4:4:1
  28. 2:25:9
  29. 72:2:4
  30. 33:3:1
  31. 33:5:6

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